💡 Meaning & story
रीइमेजिन बाय मोहम्मद फारूक
रिटन बाय जगत मोहन लाल रवां 1889 - 1934
जगतमोहन लाल रवां की यह ग़ज़ल तक़दीर और तदबीर की कशमकश, इंसानी जज़्बात और इश्क़ की लताफ़तों का एक निहायत ही दिलकश और फ़िक्र-अंगेज़ मुरक़्क़ा (चित्र) है।
अशआर की तशरीह व तफ़हीम (व्याख्या और समझ)
• तक़दीर जब मुआवीन-ए-तदबीर हो गई / मिट्टी पे की निगाह तो अक्सीर हो गई: इस शेर में शायर कहता है कि जब इंसान की कोशिश (तदबीर) के साथ उसकी क़िस्मत (तक़दीर) भी शामिल हो जाए तो नामुमकिन भी मुमकिन हो जाता है। ऐसे ख़ुश-नसीब वक़्त में अगर इंसान मिट्टी पर भी नज़र डाले तो वह सोना या पारस (अक्सीर) बन जाती है।
• दिल जां-निसार-ए-मय है ज़बां ताइब-ए-शराब / इस कशमकश में रूह की ताज़ीर हो गई: यहाँ इंसानी नफ़्सियात (मनोविज्ञान) की कशमकश बयान की गई है। दिल इश्क़ और मस्ती पर जान छिड़कता है, लेकिन ज़बान दुनियावी मस्लहतों या अक़्ल की वजह से इससे तौबा करती है। दिल और दिमाग़ की इस जंग में असल सज़ा (ताज़ीर) बेचारी रूह को भुगतनी पड़ती है।
• छींटें जो ख़ूं की दामन-ए-क़ातिल में रह गईं / महशर में मेरे क़ल्ब की तफ़सीर हो गई: रोज़-ए-क़यामत जब आशिक़ के क़त्ल का मुक़दमा पेश हुआ, तो उसे कुछ बोलने की ज़रूरत न पड़ी। क़ातिल (महबूब) के दामन पर लगी ख़ून की चंद छींटों ने ही आशिक़ के सच्चे दिल और उसकी गहरी मोहब्बत की पूरी कहानी बयां कर दी।
• या क़त्ल कीजिए मुझे या बख़्श दीजिए / अब हो गई हुज़ूर जो तक़्सीर हो गई: आशिक़ अपने महबूब के सामने मुकम्मल तौर पर सर-ए-तस्लीम ख़म करते हुए कहता है कि मुझसे जो गुनाह या ख़ता (तक़्सीर) होनी थी वह हो चुकी है। अब यह सरासर आपका इख़्तियार है कि मुझे इस जुर्म में मार डालें या माफ़ कर दें।
• शबनम ओढ़ी गुलों से मेरा नक़्शा खिंच गया / मुरझा गई कली मेरी तस्वीर हो गई: शायर अपनी ग़मगीन हालत को क़ुदरत से तशबीह देते हुए कहता है कि फूलों पर पड़ी शबनम दरअसल मेरे आंसुओं की अकासी कर रही है, और एक मुरझाई हुई कली बिल्कुल मेरी उदास और टूटी हुई तस्वीर पेश कर रही है।
• ज़िंदानियां-ए-काकुल-ए-हस्ती किधर को जाएं / इक ज़ुल्फ़ सब के पांव की ज़ंजीर हो गई: यह शेर फ़लसफ़ाना रंग लिए हुए है। दुनिया की कशिश और ज़िंदगी के झमेलों ने तमाम इंसानों को क़ैदी बना लिया है। हम सब इस दुनियावी ज़ुल्फ़ के असीर (क़ैदी) हैं जो हमारे पैरों की बेड़ी बन चुकी है, अब इस क़ैद-ए-हयात से फ़रार मुमकिन नहीं।
• मैं कह चला था दावर-ए-महशर से हाल-ए-दिल / इक सुरमगीं निगाह गुलू-गीर हो गई: मैदान-ए-हशर में जब मैं ख़ुदा (दावर-ए-महशर) के सामने अपने महबूब के ज़ुल्म की शिकायत करने ही वाला था, तो महबूब ने मेरी तरफ़ एक ऐसी नशीली और गहरी निगाह डाली कि मेरी आवाज़ हलक़ में ही फंस कर रह गई (गुलू-गीर हो गई) और मैं लब न खोल सका।
• बस थम गया सफ़ीर-ए-अमल कह के या नसीब / जिस जा पे ख़त्म मंज़िल-ए-तदबीर हो गई: इंसान की मेहनत और कोशिश बस एक ख़ास हद तक ही साथ देती है। जहाँ इंसानी अक़्ल और तदबीर की हद ख़त्म होती है, वहाँ इंसान बेबस होकर सब कुछ क़िस्मत (नसीब) के हवाले करके रुक जाता है।
• तोड़ा है दम अभी अभी बीमार-ए-हिज्र ने / आए मगर हुज़ूर को ताख़ीर हो गई: महबूब से जुदाई में तड़पने वाला आशिक़ आखिरकार मर चुका है। महबूब उसकी अयादत (हालचाल पूछने) को आया तो ज़रूर, लेकिन उसके आने में इतनी देर (ताख़ीर) हो गई कि आशिक़ की जान निकल चुकी थी।
• जब अपने आप पर हमें क़ाबू मिला रवांؔ / आसान राज़-ए-दहर की तफ़सीर हो गई: मक़्ते में रवांؔ कहते हैं कि जब इंसान ख़ुद-शनासी (आत्मज्ञान) हासिल कर लेता है और अपने नफ़्स पर क़ाबू पा लेता है, तो उसके लिए इस कायनात और दुनिया (दहर) के तमाम पोशीदा राज़ों को समझना बिल्कुल आसान हो जाता है।
Lyrics & Meaning