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Phoolon pe raqs — cover art

Song lyrics

Phoolon pe raqs

📜 Lyrics

फूलों पे रक़्स और न बहारों पे रक़्स कर गुलज़ार-ए-हस्त-ओ-बूद में ख़ारों पे रक़्स कर रक़्स कर रक़्स कर हो कर जमूद-ए-गुलशन-ए-जन्नत से बे-नियाज़ दोज़ख़ के बे-पनाह शरारों पे रक़्स कर शम-ए-सहर, फ़ुसून-ए-तबस्सुम, हयात-ए-गुल फ़ितरत के उन अजीब नज़ारों पे रक़्स कर तंज़ीम-ए-क़ायनात पे जुनूँ की हँसी उड़ा उजड़े हुए चमन की बहारों पे रक़्स कर रक़्स कर रक़्स कर सहमी हुई सदा-ए-दिल-ए-नातवाँ न सुन बहकी हुई नज़र के इशारों पे रक़्स कर रक़्स कर रक़्स कर जो मर के जी रहे थे तुझे उन से क्या ग़रज़ तू अपने आशिक़ों के मज़ारों पे रक़्स कर हर हर अदा हो रूह की गहराइयों में गुम यूँ रंग-ओ-बू की राहगुज़ारों पे रक़्स कर रक़्स कर रक़्स कर तू अपनी धुन में मस्त है तुझ को बताए कौन तेरी ज़मीन फ़लक है, सितारों पे रक़्स कर इस तरह रक़्स कर कि सरापा असर हो तू कोई नज़र उठाए तो पेश-ए-नज़र हो तू रक़्स कर रक़्स कर रक़्स कर रक़्स कर

💡 Meaning & story

Composed by Mohammad Farooq Written by Shakeel Badayuni 1916 – 1970 यह ग़ज़ल ज़िंदगी की तल्ख़ियों को मुस्कुरा कर गले लगाने और पारंपरिक सुख-सुविधाओं को ठुकरा कर एक गतिशील, निडर और भावुक जीवन जीने का शानदार दर्शन है। शायर इस कलाम में केवल फूलों और बहारों (आसानियों) के बजाय कांटों और दोज़ख के अंगारों (मुश्किलों) पर ख़ुशदिली से रक़्स करने (जीने) की सीख दे रहा है। कलाम का केंद्रीय विचार और दर्शन • ठहराव के ख़िलाफ़ बगावत: शायर जन्नत के "ठहराव" (सुस्ती और निष्क्रियता) को ख़ारिज करता है और दोज़ख के बेपनाह अंगारों (गतिशीलता, तपिश, गर्मी और संघर्ष) में जीने की बात करता है। यह वास्तव में कर्महीन सुकून पर कठिन संघर्ष को प्राथमिकता देने का सबक है। • मुसीबतों में मुस्कुराहट: दुनिया (गुलज़ार-ए-हस्त-ओ-बूद) में सिर्फ़ ख़ुशियों के पीछे भागने के बजाय कांटों (तकलीफ़ों) पर भी मस्ती से रक़्स करने की सलाह दी गई है। • इश्क़ और जुनून की मस्ती: सांसारिक बुद्धि और कमज़ोर दिल के डर को छोड़कर दीवानगी की राह अपनाने का ज़िक्र है, जहाँ प्रचलित सांसारिक नियमों (तन्ज़ीम-ए-क़ायनात) का मज़ाक उड़ाया जाता है और उजड़े हुए चमन में भी अपनी बहार ख़ुद पैदा की जाती है। अशआर की विस्तृत व्याख्या (श्रोताओं के लिए) • पहले दो शेर: ऐ इंसान! सिर्फ़ आसान और सुखद परिस्थितियों में जीना कोई कमाल नहीं। कमाल यह है कि तू इस ब्रह्मांड के कांटों और कठिनतम परिस्थितियों में भी अपने क़दमों का रक़्स (हौसला) न रुकने दे। • तीसरा और चौथा शेर: सुबह की शमा, मुस्कुराहट का जादू और फूल की ज़िंदगी बहुत संक्षिप्त होती है। प्रकृति के इन अस्थायी दृश्यों से सबक सीख और ब्रह्मांड के बने-बनाए नियमों की परवाह किए बिना अपनी दुनिया आप आबाद कर। • पांचवां और छठा शेर: अपने अंदर के सहमे हुए और कमज़ोर दिल की आवाज़ मत सुन, बल्कि अपने जज़्बों और इश्क़ के मार्गदर्शन में आगे बढ़। जो लोग जीते जी मर चुके हैं (यानी जिनमें ज़िंदगी की तपिश ख़त्म हो चुकी है) उनकी परवाह छोड़ दे और अपनी मस्ती में मग्न रह। • आख़िरी तीन शेर: यहाँ इंसान की महानता और ख़ुदी चरम पर है। शायर कहता है कि तेरी हक़ीक़त महज़ यह ज़मीन नहीं बल्कि तेरा मुक़ाम आसमान है, इसलिए सितारों पर अपने क़दम रख। अपने हर अमल को रूह की गहराइयों में डुबो कर इस तरह ज़िंदगी गुज़ार कि तू सरापा एक 'असर' बन जाए, और जब कोई नज़र उठा कर देखे तो उसे सिर्फ़ तेरा ही जलवा और तेरा ही कमाल नज़र आए।