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Darya e Shab ke par — cover art

Song lyrics

Darya e Shab ke par

📜 Lyrics

दरिया-ए-शब के पार उतारे मुझे कोई तन्हाई डस रही है पुकारे मुझे कोई गो जानता हूँ सब ही निशाने पे हैं यहाँ पागल हूँ चाहता हूँ न मारे मुझे कोई मुट्ठी सदफ़ ने भींच रखी है कि छू के देख मोती पुकारता है उभारे मुझे कोई दरिया-ए-शब के पार उतारे मुझे कोई तन्हाई डस रही है पुकारे मुझे कोई काँटों में रख के फूल हवा में उड़ा के ख़ाक करता है सौ तरह से इशारे मुझे कोई अब तक तो ख़ुदकुशी का इरादा नहीं किया मिलता है क्यों नदी के किनारे मुझे कोई दरिया-ए-शब के पार उतारे मुझे कोई तन्हाई डस रही है पुकारे मुझे कोई बिखरा हुआ हूँ वक़्त के शाने पे गर्द सा इक ज़ुल्फ़-ए-पुर-शिकन हूँ सँवारे मुझे कोई दरिया-ए-शब के [पार] उतारे मुझे कोई तन्हाई डस रही है पुकारे मुझे कोई

💡 Meaning & story

मोहम्मद फ़ारूक़ द्वारा रीइमेजिन मुज़फ़्फ़र हनफ़ी द्वारा लिखित 1936 2020 • दरिया-ए-शब के पार उतारे मुझे कोई / तन्हाई डस रही है पुकारे मुझे कोई व्याख्या: कवि ने रात (अंधेरे, दुख और विपत्ति) की तुलना एक नदी से की है। वह कहता है कि मेरी तन्हाई मुझे सांप की तरह डस रही है, काश कोई मुझे इस अंधेरी रात और दुखों की नदी के पार लगा दे। यह वास्तव में एक पुकार है कि कोई आए और उसे इस गहरे अकेलेपन से बाहर निकाले। • गो जानता हूँ सब ही निशाने पे हैं यहाँ / पागल हूँ चाहता हूँ न मारे मुझे कोई व्याख्या: कवि दुनिया की हकीकत बयां कर रहा है कि इस दुनिया में हर शख्स मौत और दुखों के निशाने पर है। कोई भी हमेशा के लिए सुरक्षित नहीं, लेकिन फिर भी यह मानवीय स्वभाव और मेरी दीवानगी है कि मैं चाहता हूँ कि मुझे कोई दुख, तकलीफ या पीड़ा न पहुँचाए। • मुट्ठी सदफ़ ने भींच रखी है कि छू के देख / मोती पुकारता है उभारे मुझे कोई व्याख्या: सदफ़ (सीप) ने अपनी मुट्ठी बंद कर रखी है। इस बंद सीप के अंदर छिपा हुआ कीमती मोती पुकार रहा है कि कोई मुझे इस खोल से बाहर निकाले ताकि दुनिया मेरी चमक देख सके। यह वास्तव में कवि के भीतर छिपे हुए जज्बातों, योग्यताओं या उसके वास्तविक व्यक्तित्व की ओर इशारा है जो दुनिया के सामने आने के लिए किसी के सहारे की प्रतीक्षा कर रहा है। • काँटों में रख के फूल हवा में उड़ा के ख़ाक / करता है सौ तरह से इशारे मुझे कोई व्याख्या: इस शेर में जिंदगी के उतार-चढ़ाव और तकदीर के फैसलों का चित्रण है। हालात कभी फूलों को काँटों में उलझा देते हैं और कभी सब कुछ धूल में मिला देते हैं। ऐसा लगता है जैसे किस्मत या कोई छिपी हुई हस्ती इन विभिन्न और विपरीत तरीकों से कवि को जीवन की सच्चाइयों के इशारे दे रही है। • अब तक तो खुदकुशी का इरादा नहीं किया / मिलता है क्यों नदी के किनारे मुझे कोई व्याख्या: कवि निराशा के आलम में नदी के किनारे खड़ा है लेकिन कहता है कि मैंने अभी जिंदगी खत्म करने का इरादा नहीं किया। फिर वह हैरान होता है कि ऐसी सुनसान जगह और उदासी की हालत में कोई उससे क्यों मिलने आ रहा है? क्या ये हालात हैं जो उसे मौत की तरफ धकेल रहे हैं या कोई उसे बचाने आ गया है? • बिखरा हुआ हूँ वक्त के शाने पे गर्द सा / इक ज़ुल्फ़-ए-पुर-शिकन हूँ सँवारे मुझे कोई व्याख्या: कवि खुद को वक्त के कंधे पर पड़ी हुई उस धूल (गर्द) की तरह महसूस करता है जिसकी कोई अहमियत नहीं होती और जो बिखरी रहती है। वह खुद को उलझी हुई जुल्फ (बालों) से उपमा देते हुए कामना करता है कि काश कोई मोहब्बत करने वाला आए और उसे सँवार दे, यानी उसकी बेतरतीब और बिखरी हुई जिंदगी को मोहब्बत से संवार दे। यह ग़ज़ल इंसान के भीतर की उस इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है जहाँ वह सब कुछ जानते-बूझते हुए भी किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश में रहता है जो उसे समझे और उसे जीवन के दुखों से बाहर निकाले।