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Ajab suroor mila hai — cover art

Song lyrics

Ajab suroor mila hai

📜 Lyrics

अजब सुरूर मिला है मुझे दुआ कर के कि मुस्कराया खुदा भी सितारा वा कर के (कि मुस्कराया खुदा भी सितारा वा कर के) अजब सुरूर मिला है मुझे दुआ कर के गिदा गिरी भी इक अस्लूबे फन है जब मैंने उसी को मांग लिया उससे इलतजा कर के शबे फिराक के हर जबर को शिकस्त हुई कि मैंने सुबह तो कर ली खुदा खुदा कर के अजब सुरूर मिला है मुझे दुआ कर के कि मुस्कराया खुदा भी सितारा वा कर के यह सोच कर कि कभी तो जवाब आएगा मैं उसके दर पे खड़ा रह गया सदा कर के यह चारा गर हैं कि इक इजतिमाए बद ज़ौक़ान वह मुझ को देखें तिरी ज़ात से जुदा कर के खुदा भी इनको न बख़्शे तो लुत्फ़ आ जाए जो अपने आप से शर्मिंदा हों खता कर के (जो अपने आप से शर्मिंदा हों खता कर के) खुद अपनी ज़ात पे तो एतिमाद पुख़्ता हुआ नदीमॢ यूँ तो मुझे क्या मिला वफ़ा कर के अजब सुरूर मिला है मुझे दुआ कर के... (अजब सुरूर मिला है मुझे दुआ कर के) कि मुस्कराया खुदा भी सितारा वा कर के

💡 Meaning & story

written by Ahmad Nadeem Qasmi 1916 – 2006 📖 शायरी की संक्षिप्त और व्यापक व्याख्या (Explanation of Verses) मतला (Opening Couplet): अजब सुरूर मिला है मुझे दुआ कर के... • व्याख्या: शायर कहते हैं कि सच्चे दिल से खुदा के सामने दुआ माँगने के बाद मुझे एक अजीब सा आध्यात्मिक शांति और खुशी मिली है। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे आसमान पर कोई तारा चमका हो और वह तारा दरअसल मेरे खुदा की मुस्कुराहट थी, जिसने मेरी दुआ की कबूलियत का इशारा दे दिया हो। पहला बंद (Verse 1): • भिखमँगी भी एक शायराना अंदाज है... o व्याख्या: फकीर बनकर माँगना भी एक सुव्यवस्थित कला है। मैंने इस कला का कमाल यह दिखाया कि जब खुदा के सामने हाथ फैलाए तो उससे दुनियावी माल-दौलत माँगने की बजाय, खुद खुदा ही को माँग लिया। • रातभर फिराक की हर तकलीफ को शिकस्त हुई... o व्याख्या: महबूब से जुदाई की रात की हर मुश्किल और अँधेरे को हार माननी पड़ी, क्योंकि मैंने सारी रात खुदा को पुकारते हुए और उसका ज़िक्र करते हुए आखिरकार सुबह की रोशनी देख ली (यानी मुश्किल वक्त कट गया)। दूसरा बंद (Verse 2): • यह सोचकर कि कभी तो जवाब आएगा... o व्याख्या: मैं अपने हकीकी महबूब (अल्लाह) के दरवाज़े पर एक बार आवाज़ लगाकर पूरी उम्मीद से खड़ा हूँ कि आज नहीं तो कल, कभी तो अंदर से मुहब्बत भरा जवाब ज़रूर आएगा। • यह दवा करने वाले हैं कि एक जमात बदज़ौक लोगों की... o व्याख्या: शायर दुनिया के उन लोगों और नाम-निहाद हमदर्दों पर तंज़ करते हैं जो इसका इलाज करने आए हैं। वह कहते हैं कि उन्हें इश्क का कोई ज़ौक नहीं; यह मेरी बीमारी का इलाज मुझे अपने महबूब (खुदा) की याद से दूर करके करना चाहते हैं, जो कि बिल्कुल नामुमकिन है। सेतु (Bridge): • खुदा भी इन्हें न बख्शे तो लुत्फ आ जाए... o व्याख्या: यह एक गहरी मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक कैफियत का शेर है। शायर कहते हैं कि जो इंसान गुनाह करने के बाद सच्चे दिल से पछताए और शर्मिंदा हो जाए, तो उसकी माफी यकीनी हो जाती है। यहाँ शायर एक नए अंदाज़ में कहते हैं कि सच्ची तौबा के बाद तो खुदा की रहमत जोश में आ ही जाती है, अगर ऐसी शर्मिंदगी के बाद भी माफी न मिले तो यह एक हैरत अंगेज़ बात होगी। (यानी सच्ची शर्मिंदगी ही असल तौबा है)। मखरा (Verse 3 - Outro): • अपनी ज़ात पर तो यकीन पक्का हुआ... o व्याख्या: ऐ नदीमॻ! मुहब्बत और वफा के इस सफर में अगरचे मुझे कोई ज़ाहिरी या दुनियावी इनाम न मिल सका, लेकिन इसका एक सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि मुझे अपनी ज़ात पर और अपने किरदार के सच्चे होने पर मुकम्मल यकीन हो गया। मेरी वफा ने मुझे अंदर से मजबूत इंसान बना दिया है।