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Kaunsa dil hai — cover art

Song lyrics

Kaunsa dil hai

📜 Lyrics

आहिस्ता आहिस्ता, साँसों में कौन सा दिल है? बता जरा दूर कहीं से सुर टूटे अंदर जलन है या दुआ? तेरे ही दर पर आ के रोए नीम अंधेरी सीढ़ियों पर दिल पे पड़ी हैं पुरानी धूलें तेरा ही नाम लिखा अब भी कौन सा दिल है जिसमें दाग नहीं इश्क की राख में अंगार हम भी हैं (हाँ) टूट के हँस दे, टूट के रो ले ज़ख़्म की ख़ुशबू के हक़दार हम भी हैं कौन सा दिल है जिसमें दाग नहीं इश्क में यादगार हम भी हैं (ओह) तूने भी शायद चोरी चोरी रात के पिछले पहर में सोचा एक सी कहानी, अलग अलग चेहरे किसको सज़ा दी, किसको बख़्शा? तू भी जला है, मैं भी जला हूँ दोनों की राह में काँटे ही काँटे फूल अगर थे, कानों में गिर के ख़्वाब को छेद गए, नींद को बाँटे कौन सा दिल है जिसमें दाग नहीं इश्क की राख में अंगार हम भी हैं (ओ जानाँ) झूठे सहारे छोड़ के देखो तन्हा जलेंगे, तो सरशार हम भी हैं कौन सा दिल है जिसमें दाग नहीं इश्क में यादगार हम भी हैं जो भी मिला है, टूटे हुए में इसने ही मुझको आईना समझा मैं भी हँसा था, मैं भी जला था फिर भी तुझी को अपना समझा (ओ ए) कौन सा दिल है जिसमें दाग नहीं इश्क की राख में अंगार हम भी हैं (हाए) साजन, तेरी ही राह में जल के वक़्त के सीने पर तलवार हम भी हैं कौन सा दिल है जिसमें दाग नहीं इश्क में यादगार हम भी हैं कौन सा दिल है? कौन सा दिल है जिसमें दाग नहीं? (आह) तू भी जला है मैं भी जला हूँ इश्क में यादगार इश्क में यादगार हम भी हैं...

💡 Meaning & story

यह गीत प्रेम, पीड़ा, जुदाई और मानवीय भावनाओं को दर्शाता है। इसमें दिल के ज़ख़्मों, इश्क़ की कठिनाइयों और दोनों पक्षों की तकलीफ़ को बेहद ख़ूबसूरत अंदाज़े में बयान किया गया है। इस गीत की तफ़सीली तशरीह यह है: 1. आग़ाज़ (Intro) "आहिस्ता आहिस्ता, साँसों में..." यहाँ शायर अपने अंदर चलने वाली कशमकश को बयान कर रहा है। वह अपने आप से या महबूब से पूछता है कि यह कौन सा दिल है जो आहिस्ता आहिस्ता साँसों में धड़क रहा है? जब दूर कहीं से कोई सुर टूटता है (यानी मायूसी होती है), तो अंदर एक अजीब सी कैफ़ियत पैदा होती है—समझ नहीं आता कि यह अंदर की जलन (तकलीफ़) है या कोई पोशीदा दुआ। 2. पहला बंद (Verse 1) "तेरे ही दर पर आ के रोए..." शायर माज़ी की यादों में खोया हुआ है। वह कहता है कि मैंने तेरे ही आस्तानों की नीम अंधेरी सीढ़ियों पर बैठ कर आँसू बहाए हैं। दिल पर वक़्त गुज़रने के साथ पुरानी धूल (यादों के जाले) जम चुकी है, लेकिन इस धूल के नीचे आज भी सिर्फ़ तेरा ही नाम लिखा हुआ है। यानी वक़्त गुज़रने के बावजूद प्रेम कम नहीं हुआ। 3. कोरस (Chorus) "कौन सा दिल है जिसमें दाग़ नहीं..." यह इस गीत का केंद्रीय विचार है। शायर कहता है कि दुनिया में ऐसा कौन सा दिल है जो इश्क़ में ज़ख़्मी न हुआ हो? हर दिल में कोई न कोई दाग़ या ज़ख़्म ज़रूर होता है। अगर इश्क़ अब राख़ बन चुका है, तो इस राख़ के अंदर छिपे हुए दहकते अंगारे हम खुद हैं। वह कहता है कि खुल कर हँस लो या टूट कर रो लो, इस प्रेम से मिलने वाले ज़ख़्मों और उनकी खुशबू पर हमारा भी उतना ही हक़ है जितना किसी और का। हम भी इस इश्क़ की तारीख़ का एक यादगार हिस्सा हैं। 4. दूसरा बंद (Verse 2) "तू ने भी शायद चोरी चोरी..." यहाँ शायर महबूब के जज़बात का अंदाज़ा लगा रहा है। वह कहता है कि शायद तूने भी रात के आख़िरी पहर (जब दुनिया सो रही होती है) छिप छिप कर मेरे बारे में सोचा होगा। हमारी कहानी तो एक जैसी है, बस चेहरे अलग अलग हैं। अब यह क़िस्मत का खेल है कि इस कहानी में किसे सज़ा मिली और किसे माफ़ी (बख़्शिश) मिली। 5. कोरस से पहले का हिस्सा (Pre-Chorus) "तू भी जला है, मैं भी जला हूँ..." प्रेम की आग में दोनों बराबर जले हैं। शायर कहता है कि हम दोनों के रास्ते में सिर्फ़ काँटे ही काँटे थे। अगर ज़िंदगी में कभी कुछ फूल (ख़ुशियाँ या ख़्वाब) आए भी, तो वह कानों (सुनने में) में कड़वी सचाई बन कर गिरे, जिन्होंने ख़्वाबों को छेद दिया और हमारी नींदें उड़ा दीं। 6. ब्रिज (Bridge) "जो भी मिला है, टूटे हुए में..." शायर कहता है कि इस टूट पफूट के दौर में जो कोई भी मुझ से मिला, उस ने मुझे एक आईना समझा (यानी लोगों ने मुझ में सिर्फ़ अपना अक्स या अपना फ़ायदा देखा)। इस सब के बावजूद, मैं हँसा भी और तकलीफ़ में जला भी, लेकिन मैंने हमेशा सिर्फ़ तुम्हें ही अपना समझा और किसी और को दिल में जगह नहीं दी। 7. आख़िरी हिस्सा (Final Reprise) "कौन सा दिल है?..." गीत के आख़िर में इन्हीं बातों को दोहराया गया है कि दुनिया का कोई दिल ज़ख़्मों से खाली नहीं। तुम भी इस आग में जले हो और मैं भी। अंजाम जो भी हो, लेकिन इश्क़ की इस दास्तान में हम हमेशा एक "यादगार" बन कर रहेंगे।