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Hisabay Umar — cover art

Song lyrics

Hisabay Umar

📜 Lyrics

उम्र के हिसाब का इतना सा बही-खाता है तुम्हें निकाल के देखा तो सब घाटा है किसी चिराग़ में हम हैं किसी कमल में हो तुम कहीं जमाल हमारा कहीं तुम्हारा है वह क्या वस्ल का लमहा था जिस के नशे में तमाम उम्र की फुरक़त हमें गवारा है हर एक सदा जो हमें बाज़गश्त लगती है न जाने हम हैं दोबारा कि यह दोबारा है वह मंकशफ़ मेरी आँखों में हो कि जलवे में हर एक हुस्न किसी हुस्न का इशारा है अजब उसूल हैं इस कारोबारे-दुनिया के किसी का क़र्ज़ किसी और ने उतारा है कहीं पे है कोई खुशबू कि जिस के होने का तमाम आलमे-मौजूद इस्तिआरा है न जाने कब था! कहाँ था मगर यह लगता है यह वक़्त पहले भी हम ने कभी गुज़ारा है ये दो किनारे तो दरिया के हो गए, हम तुम! मगर वह कौन है जो तीसरा किनारा है

💡 Meaning & story

मजद इस्लाम अमजद साहब की यह गज़ल उर्दू शायरी का एक अनमोल शाहकार है, जिसमें उन्होंने मुहब्बत, फलसफा, मेटाफिज़िक्स और ज़िंदगी के गहरे हक़ीक़त को अंतहाई खूबसूरती और सादा अल्फाज़ में परोया है। इंटरनेट पर आपके सामेईन और क़ारीईन के लिए इस का तफ़सीली और दिलनशीन मफ़हूम हाज़िर है: गज़ल की तश्रीह व तफ़हीम शेर नंबर 1 हिसाबे उम्र का इतना सा गोशवारा है तुम्हें निकाल के देखा तो सब ख़साराहै मफ़हूम: शायर अपनी ज़िंदगी का पूरा हिसाब किताब (बैलेंस शीट) सामने रख कर कहता है कि अगर मेरी ज़िंदगी से "तुम्हें" यानी मेरी मुहब्बत, मेरी मंज़िल या मेरे महबूब को माइनस (नफ़ी) कर दिया जाए, तो बाक़ी कुछ नहीं बचता। गहराई: यह शेर मादी दुनिया पर जज़बाती और रूहानी सरमाए की बरतरी को ज़ाहिर करता है। महबूब के बग़ैर तवील ज़िंदगी भी सरासर घाटे का सौदा है। शेर नंबर 2 किसी चिराग़ में हम हैं किसी कमल में हो तुम कहीं जमाल हमारा कहीं तुम्हारा है मफ़हूम: दुनिया के मुख़्तलिफ़ रंगों और खूबसूरतियों में हम दोनों ही बिखरे हुए हैं। अगर कहीं रोशनी की शक्ल में "हम" मौजूद हैं, तो कहीं कमल के फूल जैसी नज़ाकत और खूबसूरती में "तुम" हो। गहराई: यह शेर सूफ़ियाना रंग लिए हुए है, जहां मोहब्बत और महबूब कायनात के ज़र्रे ज़र्रे में आशकारा हैं। हर खूबसूरत चीज़ दरअसल इसी एक हसन का अक्स है। शेर नंबर 3 वह क्या वसाल का लम्हा था जिस के नशे में तमाम उम्र की फ़ुरक़त हमें गवारा है मफ़हूम: महबूब के साथ गुज़ारा हुआ वह एक लम्हा मिलाक़ात (वसाल) इतना सेहरअंगेज़ और ताक़तवर था कि इस के सरूर में हम ने ज़िंदगी भर की जुदाई (फ़ुरक़त) को हंसते मुस्कुराते क़बूल कर लिया। गहराई: सची मुहब्बत में वक़्त की मक़दार अहम नहीं होती, बल्कि इस लम्हे की कैफ़ियत अहम होती है। वह एक लम्हा पूरी ज़िंदगी पर भारी हो जाता है। शेर नंबर 4 हर इक सदा जो हमें बाज़गश्त लगती है न जाने हम हैं दुबारह कि यह दुबारह है मफ़हूम: दुनिया की हर आवाज़ मुझे ऐसे लगती है जैसे यह पहले भी कहीं सुनी हो (इको/Echo हो)। अब समझ नहीं आता कि हम इस दुनिया में दुबारह जन्म ले कर आए हैं, या यह कायनात ख़ुद को दहरा रही है। गहराई: यहां शायर वक़्त के दायरे (Time Cycle) और इंसानी वुजूद की अज़लीयत व अबदीयत पर सवाल उठा रहा है। यह एक गहरा फ़लसफ़ियाना तसव्वुर है। शेर नंबर 5 वह मुंकशफ़ मेरी आंखों में हो कि जलवे में हर एक हुस्न किसी हुस्न का इशारा है मफ़हूम: वह हक़ीक़त चाहे मेरी आंखों के अंदर बसीरत बन कर ज़ाहिर (मुंकशफ़) हो या बाहर दुनिया के नज़ारों में नज़र आए; दुनिया का हर आरिज़ा हुस्न दरअसल इस "असल और हक़ीक़ी हुस्न" (ख़ालिक़े हक़ीक़ी या हुस्ने अज़ल) की तरफ़ एक इशारा है। गहराई: यह क्लासिक तसव्वुफ़ का शेर है, जिसे 'वहदत अल-शहूद' या 'वहदत अल-वुजूद' के पैराए में देखा जा सकता है, जहां दुनिया की हर खूबसूरती ख़ुदा के हुस्न का अक्स है। शेर नंबर 6 अजब असूल हैं इस काराबारे दुनिया के किसी का क़र्ज़ किसी और ने उतारा है मफ़हूम: इस दुनिया के लेनदेन और असूल बड़े अजीब हैं। यहां गुनाह कोई करता है और सज़ा किसी और को मिलती है, या क़ुरबानी कोई देता है और इस का फल कोई और पाता है। गहराई: यह सामाजी नाइंसाफ़ी, मुकाफ़ाते अमल के पेचीदा नज़ाम, या फिर मुहब्बत में एक दूसरे का बोझ उठाने की खूबसूरत इकाई है। शेर नंबर 7 कहीं पे है कोई ख़ुशबू कि जिस के होने का तमाम आलमे मौजूद इस्तिआरा है मफ़हूम: कायनात में कहीं न कहीं एक ऐसी असल ख़ुशबू (हक़ीक़त/ख़ालिक़) मौजूद है, जिस की गवाही देने के लिए यह पूरी मादी दुनिया (आलमे मौजूद) महज़ एक इस्तिआरा या अलामत बन कर खड़ी है। गहराई: अगर दुनिया खूबसूरत है, तो वह इस "असल" की वजह से है जो पसपर्दा है। पूरी कायनात इस एक ज़ाते वाहिद का पता देती है। शेर नंबर 8 न जाने कब था! कहां था मगर यह लगता है यह वक़्त पहले भी हम ने कभी गुज़ारा है मफ़हूम: मुझे वक़्त और जगह तो याद नहीं, लेकिन अक्सर दिल में यह शदीद एहसास जागता है कि यह लम्हा, यह कैफ़ियत और यह वक़्त मैं पहले भी बिल्कुल इसी तरह गुज़ार चुका हूं। गहराई: नफ़्सियात में इसे "Déjà vu" कहते हैं। अमजद साहब ने इस पेचीदा नफ़्सियाती और मेटाफ़िज़िकल कैफ़ियत को शायरी के क़ालब में कमाल खूबसूरती से ढाला है। शेर नंबर 9 यह दो किनारे तो दरिया के हो गए, हम तुम! मगर वह कौन है जो तीसरा किनारा है मफ़हूम: मैं और तुम तो इस दरिया के दो किनारों की तरह हैं जो साथ चलते हैं मगर मिल नहीं सकते। लेकिन हमारे दरमियान यह कौन सा पोशीदा "तीसरा किनारा" है जो हमें आपस में जोड़े हुए है या जिस की तरफ़ हम दोनों बह रहे हैं? गहराई: यह ग़ज़ल का मक़ता (या आख़िरी शेर) है। यह तीसरा किनारा 'मुहब्बत' ख़ुद हो सकती है, 'वक़्त' हो सकता है, या 'ज़ाते बारी तआला' हो सकती है जो दो अलग वुजूदों को एक नादीदा डोर से बांधे रखती है।