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Apni jaan nazaar karoon — cover art

Song lyrics

Apni jaan nazaar karoon

📜 Lyrics

अपनी जान न्यौछावर करूँ अपनी वफा पेश करूँ क़ौम के मर्द मुजाहिद तुम्हें क्या पेश करूँ तुमने दुश्मन को जला डाला है शोला बन कर उभरा हर क़दम पर फत्ह का नारा बन कर इस शुजाअत का क्या मैं तुम्हें सिला पेश करूँ अपनी जान न्यौछावर करूँ अपनी वफा पेश करूँ क़ौम के मर्द मुजाहिद तुम्हें क्या पेश करूँ अपनी जान न्यौछावर करूँ अपनी वफा पेश करूँ उम्र भर तुम पर खुदा अपनी इनायत रखे तुम्हारी जुरात तुम्हारी अज़मत को सलामत रखे तुम्हारे जज़्बा-ए-क़ौम को सलाम पेश करूँ अपनी जान न्यौछावर करूँ अपनी वफा पेश करूँ क़ौम के मर्द मुजाहिद तुम्हें क्या पेश करूँ दिल में पैदा किया एक जज़्बा ताज़ा तुमने मेरे गीतों को नया हौसला बख़्शा तुमने क्यों न जुबां को इन्हीं गीतों की नवा पेश करूँ अपनी जान न्यौछावर करूँ अपनी वफा पेश करूँ क़ौम के मर्द मुजाहिद तुम्हें क्या पेश करूँ

💡 Meaning & story

पृष्ठभूमि (पृष्ठभूमि) १। यह कब और किस लिए लिखी गई? यह अमर राष्ट्रगीत सितंबर 1965 की भारत-पाकिस्तान युद्ध के पृष्ठभूमि में लिखा गया था। जब सितंबर 1965 में अचानक युद्ध छिड़ गई, तो रेडियो पाकिस्तान ने युद्ध गीतों और राष्ट्रगीतों के माध्यम से राष्ट्र और सेना का हौसला बढ़ाने में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई। यह गीत पाकिस्तान सेना के उन "मर्द मुजाहिद" युवकों को सम्मान देने के लिए लिखा गया था जो सीमाओं पर अपनी जानों की कुर्बानी दे रहे थे। २। कवि और गायिका (किसने लिखा और किसने गाया?) • कवि: यह जोश और भक्ति से भरपूर गीत पाकिस्तान के प्रसिद्ध गीतकार सूफी ग़ुलाम मुस्तफ़ा तबस्सुम ने लिखा था। सूफी तबस्सुम ने 1965 की युद्ध में कई उत्कृष्ट राष्ट्रगीत रचे। • संगीतकार: इसकी अमर धुन मास्टर इनायत हुसैन ने तैयार की थी, जिन्होंने मार्च की थाप और उत्साहवर्धक संगीत का ऐसा मिश्रण बनाया जो सीधा दिल में उतर जाता है। • गायिका: इसे पाकिस्तान की संगीत रानी नूर जहां ने अपनी मनमोहक और आकर्षक आवाज़ में गाया। ३। यह गीत किस तरीके से बनाया गया? 1965 की युद्ध के दौरान रेडियो पाकिस्तान लाहौर का स्टूडियो चौबीस घंटे सक्रिय था। सूफी तबस्सुम रात को पंक्तियाँ लिखते, मास्टर इनायत हुसैन सुबह तक इसकी धुन बनाते, और मैडम नूर जहां सायरनों और विस्फोटों की छाया में स्टूडियो पहुंचकर इसे रिकॉर्ड करवाती थीं। मैडम नूर जहां ने यह गीत बिना किसी मेहनताना के, विशुद्ध देशप्रेम के भाव से गाए। रिकॉर्डिंग के दौरान भावनाओं का यह आलम होता था कि अक्सर स्टूडियो में मौजूद लोगों की आँखों में आँसू आ जाते थे। कविता की विस्तृत व्याख्या (व्याख्या) कुल मिलाकर यह कविता एक कलाकार (कवि या गायक) और आम देशभक्त नागरिक की भावनाओं को दर्शाती है, जो सीमा पर लड़ने वाले योद्धा के सामने अपने को तुच्छ समझता है। छंद संख्या 1: अपनी जान न्योछावर करूँ अपनी निष्ठा समर्पित करूँ राष्ट्र के बहादुर योद्धा तुम्हें क्या दूँ अर्थ: कवि देश के रक्षक (मर्द मुजाहिद) से संबोधित होकर कहता है कि हे देश के वीर सैनिक! तू राष्ट्र और जाति के लिए इतनी बड़ी कुर्बानी दे रहा है कि मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं। अगर मैं अपनी जान भी तुम्हारे पैरों में न्योछावर कर दूँ और अपनी समस्त निष्ठा भी तुम्हें समर्पित कर दूँ, तब भी तुम्हारा अधिकार पूरा नहीं हो सकता। मैं असमंजस में हूँ कि तुम्हारी इस महानता के सामने क्या उपहार दूँ? छंद संख्या 2: तुमने दुश्मन को भस्म कर दिया एक दहकती आग बनकर उभरे हर कदम पर विजय का नारा गूँजा इस वीरता का क्या बदला मैं तुम्हें दूँ अर्थ: इस छंद में युद्ध का चित्रण किया गया है। कवि कहता है कि जब दुश्मन ने प्रिय देश पर हमला किया, तो तुम एक धधकती हुई आग बनकर उस पर टूट पड़े और दुश्मन के दुष्ट इरादों को राख में बदल दिया। तुम्हारी इस बहादुरी की वजह से हर कदम (पदक्षेप) पर पाकिस्तान की विजय और सफलता का नारा गूँजा है। तुम्हारी इस अतुलनीय वीरता और साहस का बदला (प्रतिदान) चुकाना मेरे वश में नहीं है। छंद संख्या 3: उम्र भर तुम पर ईश्वर अपनी कृपा रखे तुम्हारी साहस तुम्हारी महानता को सुरक्षित रखे शहादत की आकांक्षा का भाव प्रार्थना समर्पित करूँ अर्थ: यहाँ कवि भौतिक चीजों से हटकर योद्धा को प्रार्थनाओं का उपहार दे रहा है। वह प्रार्थना करता है कि ईश्वर आजीवन तुम पर अपनी दया और कृपा बनाए रखे। तुम्हारी साहस, निडरता और तुम्हारे इस सम्मान को सदा स्थिर और अमर रखे। तुम जिस "शहादत की आकांक्षा" के भाव से ओतप्रोत होकर युद्ध के मैदान में उतरे हो, मैं ईश्वर के समक्ष तुम्हारी इसी पवित्र भावना की स्वीकृति की प्रार्थना करता हूँ। छंद संख्या 4: दिल में पैदा किया तुमने एक नया भाव मेरे गीतों को नया साहस बख़्शा तुमने क्यों न तुम्हें इसी गीत की मधुरता समर्पित करूँ अर्थ: यह छंद विशेष रूप से कवि और कलाकार की अपनी भावनाओं को व्यक्त करता है। कवि कहता है कि हे योद्धा! सीमा पर तुम्हारी बहादुरी की गाथाओं ने हम कलमों और कलाकारों के दिलों में भी एक नया जोश और नया भाव पैदा कर दिया है। तुम्हारी निडरता ने मेरे गीतों को शब्द और साहस दिया है। इसलिए अब मेरे पास सबसे अच्छी चीज़ मेरे ये ही गीत हैं, तो क्यों न मैं अपनी आवाज़ की मिठास, अपने शब्दों की गूँज और अपने ये तराने तुम्हें समर्पित कर दूँ। यह राष्ट्रगीत आज भी जब सुना जाए तो सितंबर 1965 का वह ऐतिहासिक माहौल आँखों के सामने आ जाता है जब पूरी जनता अपनी सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी थी। क्या आप इस दौर के अन्य गीतों या सूफी तबस्सुम की अन्य कविताओं के बारे में कुछ जानना चाहते हैं?