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Pyaas honton pe rakhe — cover art

Song lyrics

Pyaas honton pe rakhe

📜 Lyrics

प्यास होंठों पर रखे, हाथ में सागर देखा उसकी आँखों में छिपा हमने समंदर देखा इक शबीह है जो नज़र आती है चारों जानिब दिल के आईने से टकराए वह पत्थर देखा चंद फूलों से साँ वर जाता है मासूम शबाब कुछ ही कलियों से महक जाए वह ज़ेवर देखा खाक का रैन बसेरा था मगर दिल का कबीर अपनी ही ज़ात में इक शख़्स कलंदर देखा प्यास होंठों पर रखे, हाथ में सागर देखा उसकी आँखों में छिपा हमने समंदर देखा हम नहीं हैं मगर आबाद है रौनक फिर भी कोचा-ए-जाँ से गुज़र जाने का मंज़र देखा

💡 Meaning & story

ग़ज़ल का केंद्रीय विचार (सारांश) शैस्ता मुफ़्ती द्वारा लिखित 1968 इस ग़ज़ल का मूल विषय इंसान के अंदर छिपे हुए गहरे दर्द, महबूब की यादें, इंसानी सादगी और दुनिया की बेनियाज़ी को बयान करना है। शायर ने यह बताने की कोशिश की है कि इंसान के अंदर एहसासात का एक समुद्र होता है जिसे वह दुनिया से छिपा कर रखता है। मज़ीद यह कि हमारे इस दुनिया से चले जाने के बाद भी दुनिया की रौनकें कम नहीं होतीं, और ज़िंदगी अपने मामूल के मुताबिक़ चलती रहती है। अशआर की तशरीह पहला शेर: प्यास होंठों पर रखे, हाथ में सागर देखा उस की आँखों में छिपा हम ने समुद्र देखा तशरीह: इस शेर में शायर कहता है कि मैंने एक ऐसे शख़्स को देखा जिसके हाथ में शराब या पानी का प्याला (सागर) था, लेकिन फिर भी इसके होंठ प्यासे थे। यानी इसके पास अपनी ख़ाहिश पूरी करने का ज़रिया तो मौजूद था, लेकिन इसने अपने पर ज़ब्त (कंट्रोल) रखा हुआ था। जब मैंने इस की आँखों में झाँक कर देखा, तो वहाँ मुझे एहसासात, दर्द और अन कही बातों का एक गहरा समुद्र दिखाई दिया। यह शेर इंसान के गहरे दुःख और ज़ब्ते-नफ़्स को ज़ाहिर करता है। दूसरा शेर: इक शबीह है जो नज़र आती है चारों जानिब दिल के आईने से टकराए वह पत्थर देखा तशरीह: शायर अपनी दीवानगी का ज़िक्र करते हुए कहता है कि मुझे हर तरफ़ सिर्फ़ एक ही शबीह (चेहरा या अक्स) नज़र आती है। मेरा दिल जो एक नाज़ुक आईने की तरह था, इस अक्स (या महबूब की यादों) ने एक पत्थर की तरह आकर मेरे दिल के आईने को चकनाचूर कर दिया। यहाँ महबूब की यादों को पत्थर और दिल को आईने से तशबीह दी गई है। तीसरा शेर: चंद फूलों से साँ वर जाता है मासूम शबाब कुछ ही कलियों से महक जाए वह ज़े-वर देखा तशरीह: इस शेर में सादगी और क़ुदरती ख़ूबसूरती की तारीफ़ की गई है। शायर कहता है कि जो मासूम जवानी और असली ख़ूबसूरती होती है, उसे सँवारने के लिए बहुत भारी भरकम ज़ेवरात या बनावट की ज़रूरत नहीं होती। वह तो बस चंद फूलों के गजरे या कलियों से ही सज सँवर जाती है और महक उठती है। असली ख़ूबसूरती सादगी में ही पोशीदा है। चौथा शेर: ख़ाक का रैन-बसेरा था मगर दिल का कबीर अपनी ही ज़ात में इक शख़्स क़लंदर देखा तशरीह: यहाँ एक फ़क़ीर या दरवेश सिफ़त इंसान का ज़िक्र है। शायर कहता है कि वह शख़्स भले ही ख़ाक (मिट्टी) में रहता था, यानी इस की ज़िंदगी बहुत ग़रीबी और सादगी से भरी थी, लेकिन इस का दिल बहुत बड़ा (कबीर) और अमीर था। वह अपनी ही दुनिया में मस्त रहने वाला एक 'क़लंदर' था, जिसे दुनियावी दौलत या दिखावे से कोई लगाव नहीं था। (पाँचवाँ शेर पहले शेर की ही तकरार है, जो ग़ज़ल में अक़्सर हुस्न पैदा करने या मक़ते से पहले कलाम में ज़ोर पैदा करने के लिए की जाती है।) छठा शेर: हम नहीं हैं मगर आबाद है रौनक फिर भी कोचा-ए-जाँ से गुज़र जाने का मंज़र देखा तशरीह: यह इस ग़ज़ल का सब से हक़ीक़त-पसंदाना और उदास कर देने वाला शेर है। शायर कहता है कि हम ने अपनी जान के कोचे (यानी इस दुनिया या महबूब की गली) से गुज़र जाने (मरने या रुख़सत होने) का मंज़र देख लिया है। हम ने यह महसूस किया है कि हमारे चले जाने के बाद भी यहाँ की रौनकों में कोई कमी नहीं आई है। दुनिया किसी के लिए नहीं रुकती, हमारे होने या न होने से इस दुनिया की महफ़िलों पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, वह वैसे ही आबाद रहती हैं।