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Main apne aap ko (Duet) — cover art

Song lyrics

Main apne aap ko (Duet)

📜 Lyrics

मैं अपने आप को पहचानने से क़ासिर हूँ मगर यह बात अभी मानने से क़ासिर हूँ तू मेरी रूह का हिस्सा है, जान ले जानाँ मैं तेरे बिन यह सफर काटने से क़ासिर हूँ वह हर किसी पर बराबर कभी नहीं खुलता सो जान कर भी उसे जानने से क़ासिर हूँ खुली किताब हूँ तेरी निगाह के आगे मैं दिल की बात को तुझ से छिपाने से क़ासिर हूँ अभी तो कारे जहाँ से उलझ रही हूँ मैं यह ख़ाके दश्ते अभी छानने से क़ासिर हूँ तू मेरा हाथ पकड़ ले, जहाँ को भूल भी जा मैं अब यह दर्द अकेले सहारने से क़ासिर हूँ कभी कभार जफा को भी दिल मचलता है मैं सर पे अबरे वफा तानने से क़ासिर हूँ तेरी जफा भी मुझे लगती है वफा जैसी मैं तेरे ऐब को दिल से निकालने से क़ासिर हूँ तू सच के साथ मिलाता है झूठ बातों में तुझे मैं आईना गरदानने से क़ासिर हूँ मेरा वुजूद है उलझा हुआ तेरे ही लिए मैं अपने आप को तुझ बिन साँ वारने से क़ासिर हूँ मैं अपने आप को पहचानने से क़ासिर हूँ मैं तेरे बिन यह सफर काटने से क़ासिर हूँ

💡 Meaning & story

ट्रैक का विवरण (Track Description) पुनः कल्पना मोहम्मद फारूक द्वारा "मैं अपने आप को पहचानने में असमर्थ हूँ" — एक श्रव्य और भावनात्मक संवाद यह गजल (Duet) केवल एक गीत नहीं बल्कि दो प्रेम करने वाली आत्माओं के बीच एक गहरा संवाद है। इस नगमे में स्पेनिश फ्लेमेंको (Spanish Flamenco) की तीव्र और उत्साही धुनों को आधुनिक हिंदी गजल की संवेदनशीलता के साथ पूर्ण सौंदर्य से बुना गया है। इस रचना में दो भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किए गए हैं: महिला की आवाज (संघर्ष और खोज): गजल का पहला पहलू एक ऐसी उलझी हुई दशा को दर्शाता है जहाँ मनुष्य अपनी पहचान खो बैठता है। संसार की उलझनों (कार-ए-जहाँ) और रिश्तों के सच-झूठ में वह इतनी खो चुकी है कि अपने आप पर और अपने प्रिय पर पूर्ण विश्वास करने में असमर्थ है। यह भाग एक गहरी मनोवैज्ञानिक संघर्ष और मानवीय कमजोरियों की स्वीकृति है। पुरुष की आवाज (विश्वास और आश्रय): इसके उत्तर में पुरुष की आवाज एक मजबूत सहारे के रूप में उभरती है। वह प्रिया की सभी उलझनों, खामियों और संदेहों को खुले दिल से स्वीकार करता है। वह बताता है कि उसका अपना अस्तित्व प्रिया के बिना अधूरा है और वह उसके हर दर्द को बाँटने के लिए तैयार है। वह प्रिया की "जफा" को भी "वफा" समझकर उसके साथ जुड़े रहना चाहता है। यह नगमा दरअसल इस बात का सुंदर अभिव्यक्ति है कि जब मनुष्य दुनिया की भीड़ में अपने आप को भूलने लगे, तो सच्ची प्रेम और निष्ठापूर्ण साथ उसे उसका खोया हुआ प्रतिबिंब वापस लौटा देता है।