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Zindagi se yahi gila — cover art

Song lyrics

Zindagi se yahi gila

📜 Lyrics

ज़िंदगी से यही शिकायत है मुझे तू बहुत देर से मिला है मुझे तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल हार जाने का हौसला है मुझे दिल धड़कता नहीं थरथराता है कल जो ख्वाहिश थी ज़ख़्म है मुझे ज़िंदगी से यही शिकायत है मुझे तू बहुत देर से मिला है मुझे हम सफर चाहिए भीड़ नहीं एक मुसाफिर भी कारवां है मुझे कोह-ए-कन हो कि क़ैस हो कि फ़राज़ सब में एक शख़्स ही मिला है मुझे ज़िंदगी से यही शिकायत है मुझे तू बहुत देर से मिला है मुझे

💡 Meaning & story

शायरी की व्याख्या लिखित अहमद फराज़ 1931 - 2008 १. मतला (पहला शेर): ज़िंदगी से यही गिला है मुझे तो बहुत देर से मिला है मुझे व्याख्या: शायर अपनी ज़िंदगी से शिकायत कर रहा है कि महबूब उसे इस वक़्त मिला है जब ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा गुज़र चुका है। यह "देर से मिलना" इस बात की निशानी है कि जो खुशियाँ और वक़्त उसे महबूब के साथ गुज़ारना चाहिए था, वह बर्बाद हो गया। २. दूसरा शेर: तो मुहब्बत से कोई चाल तो चल हार जाने का हौसला है मुझे व्याख्या: यहाँ शायर महबूब को एक चुनौती दे रहा है या दावत दे रहा है। वह कहता है कि तुम मुहब्बत का कोई ऐसा अंदाज़ अपनाओ (चाहे वह मुझे शिकस्त देने के लिए ही क्यों न हो), क्योंकि मेरे अंदर अब हार माननے का हौसला पैदा हो चुका है। मैं तुम्हारी मुहब्बत में मिटने या क़ुरबान होने के लिए पूरी तरह तैयार हूँ। ३. तीसरा शेर: दिल धड़कता नहीं टपकता है कल जो ख़्वाहिश थी आबले है मुझे व्याख्या: यह शेर अत्यंत दर्दनाक है। शायर कहता है कि मेरा दिल अब सुकून से धड़कता नहीं, बल्कि इससे दर्द के क़तरे टप रहे हैं। और कल तक जो मेरे दिल में किसी को पाने की ख़ूबसूरत 'ख़्वाहिश' थी, अब वह एक 'आबले' (छाले) की तरह तकलीफ़देह बन चुकी है जिसे छूना भी दर्द का कारण है। ४. चौथा शेर: हम सफर चाहिए हुजूम नहीं इक मुसाफ़िर भी क़ाफ़िला है मुझे व्याख्या: शायर तन्हाई पसंद है या शायद उसे सिर्फ़ अपने महबूब की तलाश है। वह कहता है कि मुझे दुनिया की भीड़ या बहुत से लोगों की ज़रूरत नहीं, मुझे तो सिर्फ़ एक ऐसा हम सफर चाहिए जो मेरे साथ हो। अगर वह एक शख़्स भी मुझे मिल जाए तो वह मेरे लिए किसी बड़े क़ाफ़िले से कम नहीं है। ५. मक़ता (आखिरी शेर): कोह-कन हो कि क़ैस हो कि फ़राज़ؔ सब में इक शख़्स ही मिला है मुझे व्याख्या: यह इस ग़ज़ल का सबसे गहरा शेर है। शायर कहता है कि चाहे वह फ़रहाद (कोह-कन) हो, मजनूँ (क़ैस) हो, या ख़ुद अहमद फ़राज़ हो, तारीख़ के तमाम आशिकों की दास्तानों में मुझे सिर्फ़ एक ही किरदार नज़र आता है—यानी "आशिक"। यानी हर दौर का आशिक एक ही तरह की तकलीफ़, एक ही तरह की महरूमी और एक ही तरह के इश्क़ से गुज़रता है। मुहब्बत का दर्द सब के लिए एक जैसा ही रहा है। मरकज़ी ख़्याल इस पूरी ग़ज़ल का निचोड़ यह है कि मुहब्बत एक ऐसा जज़्बाती तजुर्बा है जो इंसान को तन्हाई, दर्द, और इंतिज़ार के सफ़र पर डाल देता है। शायर के नज़दीक मुहब्बत सिर्फ़ एक जज़्बा नहीं, बल्कि एक ऐसा इम्तिहान है जिसमें इंसान सब कुछ हारने के लिए तैयार हो जाता है, और इस सफ़र में उसे हर आशिक की कहानी में अपनी ही कहानी की झलक दिखाई देती है।