Farooq Music Lyrics & Meaning
← All songs
Ek Darkhwast — cover art

Song lyrics

Ek Darkhwast

📜 Lyrics

ज़िंदगी के जितने दरवाज़े हैं मुझ पर बंद हैं देखना, हद-ए-नज़र से आगे बढ़कर देखना भी जुर्म है सोचना, अपने अक़ीदों और यक़ीनों से निकलकर सोचना भी जुर्म है आसमां दर आसमां असरार की परतें हटाकर झांकना भी जुर्म है क्यों भी कहना जुर्म है कैसे भी कहना जुर्म है सांस लेने की तो आज़ादी मुयस्सर है मगर ज़िंदा रहने के लिए इंसान को कुछ और भी दरकार है और उस कुछ और भी का तज़किरा भी जुर्म है ए खुदावंदान-ए-ईवान-ए-अक़ाइद ए हुनरमंदान-ए-आईन-ओ-सियासत ज़िंदगी के नाम पर बस एक इनायत चाहिए मुझको इन सारे जराइम की इजाज़त चाहिए मुझको इन सारे जराइम की इजाज़त चाहिए मुझको इन सारे जराइम की इजाज़त चाहिए

💡 Meaning & story

एक विनती अहमद नदीम कासमी नज़्म का पस्मंज़र और मर्कज़ी ख़्याल (केंद्रीय विषय) यह नज़्म समाज में मौजूद मानसिक, विचारधारात्मक और नीतिगत दमन के विरुद्ध एक अत्यंत शक्तिशाली विरोध है। शायर एक ऐसी जर्जर व्यवस्था की कठोर आलोचना कर रहा है जहाँ इंसान को सांस लेने तक की आजादी है, किंतु उसकी सोच, चेतना और प्रश्न करने की क्षमता पर पहरे लगा दिए गए हैं। यह एक सचेत इंसान की पुकार है जो विश्वास और राजनीति के ठेकेदारों से अपने जीने का और अपने इंसान होने का मौलिक अधिकार माँग रहा है। आशारों की विस्तृत व्याख्या (छंद-दर-छंद व्याख्या) १. विचारधारात्मक बंधन और दूरदर्शिता पर पहरे जीवन के जितने भी दरवाज़े हैं मेरे लिए बंद हैं, देखो, दृष्टि की सीमा से परे देखना भी अपराध है व्याख्या: शायर कहता है कि इस समाज में प्रगति, सत्य और वास्तविक जीवन के सभी मार्ग बंद कर दिए गए हैं। यहाँ केवल उतना देखने की अनुमति है जितना व्यवस्था चाहती है। यदि कोई व्यक्ति अपनी दूरदर्शिता का उपयोग करते हुए गहरी सोच-विचार करे या सतही परिस्थितियों के पीछे छिपी हकीकतों को देखने का प्रयास करे, तो उसे समाज का विद्रोही और अपराधी समझा जाता है। २. विश्वासों की कैद और ब्रह्मांड की खोज पर प्रतिबंध सोचना, अपने विश्वासों से परे सोचना भी अपराध है, आकाश के रहस्यों की परतें हटाकर झाँकना भी अपराध है व्याख्या: यह पंक्ति अंधी नकल पर प्रहार है। इंसान को सदियों पुरानी मान्यताओं और परंपराओं का बंधक बना दिया गया है। यदि कोई पारंपरिक दायरे से बाहर निकलकर नए दृष्टिकोण से सोचने का प्रयास करे या ब्रह्मांड के गोपन रहस्यों (विज्ञान, दर्शन और आध्यात्मिकता) को खोजने की कोशिश करे, तो उसके विचारों पर धर्मविरोधिता या विद्रोह का फरमान जारी कर दिया जाता है। ३. प्रश्न करने की निषेधता और अधूरी आजादी क्यों कहना भी अपराध है, कैसे कहना भी अपराध है, सांस लेने की तो आजादी मिली है लेकिन... जीने के लिए इंसान को कुछ और भी चाहिए और इस कुछ और का जिक्र भी अपराध है व्याख्या: इस समाज में "क्यों" और "कैसे" जैसे प्रश्न उठाना अर्थात् आलोचनात्मक चेतना (Critical Thinking) कठोरता से वर्जित है। हमें केवल मरी हुई लाशों की तरह सांस लेने की अनुमति दी गई है। लेकिन शायर बताता है कि इंसान केवल रोटी और साँस का मोहताज नहीं है, उसे आत्मसम्मान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानसिक आजादी भी चाहिए (कुछ और भी चाहिए)। किंतु दुर्भाग्य यह है कि इन बुनियादी मानवाधिकारों का नाम लेना भी एक अपराध बन गया है। ४. सत्ताधारियों से सीधा संबोधन (चरम बिंदु) हे विश्वासों के महलों के स्वामियो! हे संविधान और राजनीति के कारीगरो! व्याख्या: यहाँ शायर का स्वर अत्यंत गरिमामय और शक्तिशाली हो जाता है। वह सीधे उन लोगों को ललकारता है जो धर्म (विश्वासों का महल) और राजनीति (संविधान) के नाम पर तानाशाह बने बैठे हैं और जिन्होंने जनता की सोच को गुलाम बना रखा है। ५. विद्रोह और आजादी की घोषणा जीवन के नाम पर केवल एक कृपा चाहिए! मुझे इन सभी अपराधों की अनुमति चाहिए! व्याख्या: यह नज़्म का शिखर (Climax) और सबसे शक्तिशाली अंश है। शायर इन सत्ताधारियों से जीवन के नाम पर केवल एक ही भीख या रियायत माँगता है: कि मुझे तुम्हारे बनाए गए इन सभी झूठे कानूनों को तोड़ने की अनुमति दो। मैं सोचना चाहता हूँ, ब्रह्मांड को खोजना चाहता हूँ और प्रश्न करना चाहता हूँ। यदि तुम्हारी नजर में ये सब अपराध हैं, तो हाँ, मुझे ये सारे अपराध करने की अनुमति चाहिए ताकि मैं एक सच्चे और आजाद इंसान की तरह जी सकूँ। श्रोताओं के लिए आपका संदेश (सारांश): "यह गीत केवल एक गान नहीं है, बल्कि मानवीय चेतना की जागृति का गीत है। जब संगीत मंद पड़ता है तो वह उस दमन और असहायता को प्रकट करता है जो एक इंसान अनुभव करता है। और जब संगीत अपने चरम बिंदु पर पहुँचकर शक्तिशाली हो जाता है, तो वह दरअसल इंसान की इस बगावत और चीख को प्रकट करता है जो अपनी मानसिक आजादी के लिए सभी जंजीरें तोड़ देना चाहती है।"