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Pathar — cover art

Song lyrics

Pathar

📜 Lyrics

रेत से बुत न बना ऐ मेरे अच्छे फन्कार एक लमहे को ठहर मैं तुझे पत्थर ला दूँ मैं तिरे सामने अंबार लगा दूँ लेकिन कौन से रंग का पत्थर तिरे काम आएगा सुर्ख पत्थर जिसे दिल कहती है बेदिल दुनिया या वह पत्थराई हुई आँख का नीला पत्थर जिस में सदियों के तहय्युर के पड़े हों डोरे क्या तुझे रूह के पत्थर की जरूरत होगी जितने मायार हैं इस दौर के सब पत्थर हैं शायर भी रक़स भी तस्वीर व गीत भी पत्थर जितने मायार हैं इस दौर के सब पत्थर हैं जितनी अक़दार हैं इस दौर की सब पत्थर हैं जिस पे हक बात भी पत्थर की तरह गिरती है इक वह पत्थर है जो कहलाता है तहज़ीबे सफ़ेद उस के मरमर में सियाह खून झलक जाता है एक इंसाफ़ का पत्थर भी तो होता है मगर हाथ में तीशे ज़र हो तो वह हाथ आता है सब्ज़ा व गुल भी हवा और फ़ज़ा भी पत्थर मेरा इल्हाम तिरा जिहने रसा भी पत्थर इस ज़माने में तो हर फन का निशां पत्थर है हाथ पत्थर हैं तिरे मेरी ज़ुबां पत्थर है जितने मायार हैं इस दौर के सब पत्थर हैं शायर भी रक़स भी तस्वीर व गीत भी पत्थर जितने मायार हैं इस दौर के सब पत्थर हैं जितनी अक़दार हैं इस दौर की सब पत्थर हैं रेत से बुत न बना ऐ मेरे अच्छे फन्कार

💡 Meaning & story

احمد ندیم قاسمی کی شہرہ آفاق नظम "पत्थर" का تफसीली خुलासा मरकजी ख़्याल: यह नज़्म आधुनिक समाज की बे-हिसी, माद्दियत परस्ती, और इंसानी जज़्बात के मर जाने का एक तल्ख़ नोहा है। अहमद नदीम क़ासमी एक फनकार से मुख़ातब होकर कहते हैं कि उसे रेत के कमजोर और कच्चे बुत बनाने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि इस दौर में हर तरफ़ पत्थर ही पत्थर दस्तयाब हैं। इस नज़्म में "पत्थर" बे-हिसी, ज़ुल्म, जमूद, और मुर्दा दिली की अलामत है। नज़्म के अहम पहलू और तशरीह: احساسात का ज़वाल: शाइर कहता है कि दुनिया इस क़द्र बे-हिस हो चुकी है कि जिसे लोग 'दिल' कहते हैं, वह अब महज़ एक सुर्ख़ पत्थर बन चुका है। इसी तरह सदमे और दुःख़ से पत्थराई हुई आँखें एक नीले पत्थर की मानिंद हो गई हैं, जिनमें सदियों की हैरत रकी हुई है। अब इंसानों में रूह के नर्म जज़्बात बाक़ी नहीं रहे। तहजीब की मुनाफ़िक़त: नाम निहाद जदीद और बज़ाहिर इजली तहजीब (तहजीबे सफ़ेद) दरअसल अंदर से ज़ालिम और ख़ोखली है, जिसके सफ़ेद संगमरमर में से काला और बहीमाना ख़ून झलकता है। इस मआशरे में अगर कोई सच्ची बात भी कहे, तो वह लोगों पर पत्थर की तरह गिरान गुज़रती है। इंसाफ़ का बिक जाना: इंसाफ़ भी इस मआशरे में एक पत्थर की शक्ल इख़्तियार कर गया है, जिसे सिर्फ़ वही तोड़ सकता है या हासिल कर सकता है जिसके हाथ में दौलत की कुलहाड़ी (तेशए ज़र) हो। ग़रीब के लिए इस मआशरे में इंसाफ़ नापैद है। अक़दार और फुनून की मौत: आज के दौर में तमाम अक़दार और मेयार पत्थर हो चुके हैं। शाइरी, रक़स, संगीत, और नक़्क़ाशी जैसे लतीफ़ फुनून से भी रूह निकल चुकी है। हत्ता कि फ़ित्रत (सब्जा ओ गुल), इंसान का इल्हाम, ज़हन, और ज़बान भी पत्थर की तरह सख़्त और बे-हिस हो गए हैं। हर्फ़े आख़िर: इस नज़्म के ज़रिए शाइर यह पैग़ाम देता है कि हमने बज़ाहिर बहुत तरक़्क़ी कर ली है, लेकिन अंदरूनी तौर पर हम पत्थर बन चुके हैं, जहाँ मुहब्बत, सच्चाई, और ख़ालिस जज़्बात की कोई क़द्रोक़ीमत नहीं रही।