💡 Meaning & story
ابنِ انشاء की ग़ज़ल का जामع मफहूम
यह मशहूर व मारूफ़ और सहर अंगेज़ ग़ज़ल उर्दू के मायाए नाज़ शायर ابنِ انشाء की तख़लीक़ है। इसका मरकज़ी ख़याल महबूब के लाज़वाल हुस्न का इअतराफ़, आशिक़ की बे लौस महब्बत, और इश्क़ में मिलने वाली दीवानगी का इंतिहाई ख़ूबसूरती और लतीफ़ बयान है।
हुस्न का चर्चा और आशिक़ की ख़ामोशी: आशिक़ बताता है कि हर तरफ़ महबूब के चाँद जैसे चेहरे का चर्चा है, लेकिन वह महब्बत के तक़ाज़ों को निभाते हुए और महबूब के भरम और परदे की ख़ातिर महफ़िल में ख़ामोश रहता है ताकि महबूब की रुसवाई न हो।
काइनात पर महबूब का क़ब्ज़ा: महबूब की बे नियाज़ी का यह आलम है कि वह आशिक़ की वारफ़तगी की परवाह नहीं करता। आशिक़ दुनिया त्यागकर जोगी बनना चाहता है, लेकिन उसे जंगल, पर्वत, सहरा और बस्ती, ग़रज़ हर जगह सिर्फ़ महबूब ही का राज और जलवा नज़र आता है, इसलिए फ़रार की कोई राह नहीं।
आशिक़ की आजिज़ी और महबूब का सितम: आशिक़ अपनी शराफ़त का वास्ता देकर कहता है कि इसने फ़क़ीरे राहगुज़र होते हुए भी कभी महबूब का रास्ता नहीं रोका या दामन नहीं थामा, फिर भी इस पर सख़्ती की नज़र रखी जाती है।
मक़ता का हसीन तनज़: आख़िर में शायर एक इंतिहाई दिलकश और चलबला तनज़ करता है कि ए महबूब! तू यक़ीनन हसीन है, लेकिन तेरे हुस्न को यह आलमगीर शहरत और दवाम दरअसल तेरे इस दीवाने शायर (ابنِ انشाء) की लाज़वाल शायरी ही की बदौलत मिला है।
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