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Rose in the autumn — cover art

Song lyrics

Rose in the autumn

📜 Lyrics

खिज़ां की रुत में गुलाब लहजा बना कर रखना कमाल यह है हवा की ज़द पे दिया जलाना जला कर रखना कमाल यह है ज़रा सी लग़ज़िश पे तोड़ देते हैं सब तअल्लुक ज़माने वाले सौ ऐसे वैसुओं से भी तअल्लुक बना कर रखना कमाल यह है किसी को देना यह मश्वरा कि वह दुख बिछड़ने का भूल जाए और ऐसे लम्हे में अपने आंसू छुपा कर रखना कमाल यह है ख़याल अपना मिज़ाज अपना पसंद अपनी कमाल क्या है जो यार चाहे वह हाल अपना बना कर रखना कमाल यह है किसी की राह से खुदा की ख़ातिर उठा कर कांटे हटा कर पत्थर फिर उस के आगे निगाह अपनी झुका कर रखना कमाल यह है वह जिस को देखे तो दुख का लश्कर भी लड़खड़ाए शिकस्त खाए लबों पे अपने वह मुस्कराहट सजा कर रखना कमाल यह है हज़ार ताक़त हो, हूं सौ दलीलें फिर भी लहजे में आजिज़ी से अदब की लज़्ज़त, दुआ की खुशबू, बसा कर रखना, कमाल यह है

💡 Meaning & story

غزल کا مरकजी खयाल (सार) - मुबारिक सिद्दीकी द्वारा लिखित इस ग़ज़ल का बुनियादी महौर "ज़र्फ़, सब्र और आलीअ ज़र्फ़ी" है। शायर कहते हैं कि अच्छे हालात में तो हर कोई अच्छा बन जाता है, लेकिन असल कमाल (खूबी) यह है कि जब हालात मखालिफ़ हों, लोग मतलबी हों और ज़िंदगी मुश्किल हो, तब भी इंसान अपने अंदर की अच्छाई, आजिज़ी और मुहब्बत को ज़िंदा रखे। 📝 शेर-ब-शेर आसान तशरीह शेर नंबर 1 खज़ां की रुत में गुलाब लहजा बनाकर रखना कमाल यह है। हवा की ज़द पर दीया जलाना, जला कर रखना कमाल यह है। • मफ़हूम: जब हर तरफ़ निराशा, तलखी या ग़ुस्से का माहौल हो (खज़ां की रुत), ऐसे में भी अपने बोल-चाल में नरमी और मुहब्बत (गुलाब लहजा) बरक़रार रखना असल बहादुरी है। ठीक इसी तरह, जैसे तेज़ आंधी और मखालिफ़ हवाओं के सामने न सिर्फ़ चराग़ जलाना बल्कि इसे बुझने से बचाए रखना कमाल होता है। यह शेर इंसान को हालात के धारे में बहने के बजाय मज़बूत रहने का हौसला देता है। शेर नंबर 2 ज़रा सी लग़ज़िश पर तोड़ देते हैं सब तअल्लुक़ ज़माने वाले। सौ ऐसे वैसों से भी तअल्लुक़ बनाकर रखना कमाल यह है। • मफ़हूम: दुनिया का यह दस्तूर है कि लोग किसी की एक छोटी सी ग़लती या कोताही पर बरसों के तअल्लुक़ पल-भर में खत्म कर देते हैं। लेकिन एक आलीअ ज़र्फ़ इंसान वह है जो दुनिया के इस रवैये को जानते हुए भी, ऐसे कम ज़र्फ़ या मतलबी लोगों (ऐसे वैसों) से भी रिश्ता निभाए रखता है, उन्हें माफ़ करता है और तलखी पैदा नहीं होने देता। शेर नंबर 3 किसी को देना यह मशवरा कि वह दुख बिछड़ने का भूल जाए। और ऐसे लमहे में अपने आंसू छुपाकर रखना कमाल यह है। • मफ़हूम: यह शेर जज़बात की इंतहा है। जब आप ख़ुद अंदर से टूटे हुए हों, किसी के बिछड़ने के ग़म से गुज़र रहे हों, लेकिन किसी दूसरे दुखी इंसान को हौसला देने के लिए आप मुस्कुरा कर कहें कि "सब ठीक हो जाएगा, ग़म भूल जाओ"। अपने आंसू पीकर दूसरों के ज़ख़्मों पर मरहम रखना सची हमदर्दी और कमालِ ज़बत है। शेर नंबर 4 ख़्याल अपना, मिज़ाज अपना, पसंद अपनी—कमाल क्या है। जो यार चाहे वह हाल अपना बनाकर रखना कमाल यह है। • मफ़हूम: मुहब्बत और दोस्ती का तक़ाज़ा सिखाता हुआ शेर। शायर कहते हैं कि अपनी मर्ज़ी से जीना, अपनी पसंद-नापसंद पर अड़ जाना कोई बड़ी बात नहीं है। असल कमाल तो यह है कि इंसान मुहब्बत में अपनी अना (Ego) को छोड़ दे और अपने महबूब या मखलिस दोस्त की ख़ुशी की ख़ातिर ख़ुद को उसके सांचे में ढाल ले। शेर नंबर 5 किसी की राह से ख़ुदा की ख़ातिर उठा कर कांटे हटा कर, पत्थर। फिर उसके आगे निगाह अपनी झुका कर रखना कमाल यह है। • मफ़हूम: यह शेर खालिसतन नेकी और आजिज़ी का दर्स देता है। किसी की मदद करना, इसकी मुश्किलात (कांटे और पत्थर) दूर करना बहुत नेकी का काम है, लेकिन इससे भी बड़ा कमाल यह है कि नेकी करने के बाद इस पर एहसान न जताया जाए, बल्कि शर्मिंदगी और आजिज़ी से अपनी नज़रें झुका ली जाएं ताकि सामने वाले की इज़्ज़तِ नफ़्स मजरूह न हो। यह नेकी का आलीतरीन दर्जा है। शेर नंबर 6 वह जिसको देखे तो दुख का लश्कर भी लड़खड़ाए, शिकस्त खाए। लबों पर अपने वह मुस्कुराहट सजा कर रखना कमाल यह है। • मफ़हूम: ज़िंदगी में जब मसाइब और दुखों का पूरा लश्कर आप पर हमला आवर हो, तो इंसान हिम्मत हार जाता है। लेकिन अगर ऐसे में भी इंसान हिम्मत न हारे और अपने चेहरे पर एक जांदार मुस्कुराहट सजा ले, तो वह मुस्कुराहट इतनी ताक़तवर होती है कि बड़े से बड़ा दुख भी इसके सामने घुटने टेक देता है। यानी मुस्कुराहट को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाना कमाल है। शेर नंबर 7 हज़ार ताक़त हो, हों सौ दलीलें। फिर भी लहजे में आजिज़ी से अदब की लज़्ज़त, दुआ की खुश्बू बसा कर रखना, कमाल यह है। • मफ़हूम: जब इंसान के पास ताक़त, इक़्तिदार, दौलत या बहस जीतने के लिए मज़बूत दलीलें हों, तो अक्सर वह मग़रूर हो जाता है। लेकिन असल खानदानी और बाअख़लाक़ इंसान वह है जो सब कुछ होते हुए भी अपने लहजे को आजिज़ रखे। इसकी गुफ़्तगू में अदब का रस हो और इसकी ज़बान से दूसरों के लिए बद-दुआ के बजाय दुआ की खुश्बू आए। ताक़त के उरूज पर आजिज़ी का दामन न छोड़ना ही इंसानियत का उरूज है।