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Taqdeer & Tadbeer — cover art

Song lyrics

Taqdeer & Tadbeer

📜 Lyrics

मैं मिहनत का हूँ शैदाई मैं अक्ल के बल पर ही बदल दूँगा यह तरहाई तदबीर अगर मेरे इशारों पे चलेगा हर मंजिल मकसूद मेरी राह मिलेगी यह बैठ के तकदीर का बहाना है काहिल का कोशिश से बदल जाता है रुख मौज साहिल का तू भटकता है फक़त अपने गुरूर में! तू सोचती रह जाती है अक्ल, मैंने देखा है होता है वुह जो लौह अजल पर लिखा है। तू नक़्श बनाता है, वह पल में मिटा देगा, तू ख़ाक का पुतला है, वह मिट्टी में मिला देगा मैं मिहनत पैहम, मैं चाक गिरेबाँ के लिए बनती हूँ मरहम! मैं सहरा को दरिया में बदल कर ही रहूँगा, मैं वक़्त के धारे से भी लड़ता ही रहूँगा नादाँ तू क्या है शाहों के जो ताज उतरे, वह मेरे सिवा क्या है तू कर जतन लाख अपनी जगह पर मेरे दोस्त, चलता है वुह, लिखी है रब ने जो खुदाई। आखिर को तेरी अक्ल इसी दर पे झुकेगी मेरी आँखों में नमूदार हुआ ग़म।।। आखिर को हुआ नक़्श क़ज़ा और भी महकम! जीती है तकदीर ही, रब की रिज़ा बन कर

💡 Meaning & story

गीत का केंद्रीय अर्थ और परिचय शीर्षक: नियति और तदबीर का संवाद (मनुष्य की बुद्धि और ईश्वर की रजा का शाश्वत टकराव) यह गीत मात्र एक गीत नहीं, बल्कि मानवीय संकल्प और ब्रह्मांड की अटल सत्य के बीच चलती एक गहरी मानसिक और आध्यात्मिक बहस है। इस गीत में दो भिन्न पीढ़ियों और विचारधाराओं के मनुष्यों को आमने-सामने लाया गया है: • पहला पात्र (युवा - तदबीर का समर्थक): यह एक उत्साही, मेहनती और बुद्धि पर विश्वास करने वाला युवा है, जो मानता है कि मनुष्य अपनी बुद्धि, ज्ञान और कठोर परिश्रम (तदबीर) के बल पर दुनिया की हर कठिनाई का समाधान निकाल सकता है और अपनी किस्मत खुद बदल सकता है। उसका लहजा आक्रामक, उत्साही और आत्मविश्वास से भरपूर है। • दूसरा पात्र (बुजुर्ग - नियति का समर्थक): यह जीवन का लंबा अनुभव रखने वाला एक विद्वान बुजुर्ग है, जो दुनिया की अस्थिरता और ईश्वर की रजा (नियति) की शक्ति से परिचित है। वह युवा को बड़े प्रेम, मधुर लहजे और ज्ञान के साथ समझाता है कि मनुष्य चाहे जितनी बुद्धि लगा ले और महल खड़े कर ले, अंततः वही होता है जो लौह-ए-अज़ल पर लिख दिया गया है। ________________________________________ शेरों का चरणबद्ध सरल हिंदी अर्थ पहला चरण: तदबीर का दावा और उत्साह गीत के शुरुआत में युवा पूरे जोश के साथ अपनी मेहनत और बुद्धि का बचाव करता है। वह कहता है कि बुद्धि ही सभी सफलताओं की नींव है। मनुष्य अगर बुद्धि और तदबीर से काम ले तो वह रेगिस्तानों और वीरानों को भी गुलज़ार बना सकता है। उसके निकट नियति का रोना केवल वही लोग रोते हैं जो सुस्त और आलसी होते हैं, क्योंकि सच्ची कोशिश से समुद्र की लहरों का रुख भी मोड़ा जा सकता है। दूसरा चरण: बुजुर्ग की बुद्धिमानी और यथार्थवाद युवा की बातें सुन कर बुजुर्ग मुस्कुराते हैं और उसके क्रोध के जवाब में अत्यंत मधुर और गरिमामय अंदाज़े में कहते हैं कि यह तुम्हारी बुद्धि का घमंड है जो तुम्हें सच देखने नहीं दे रहा। मनुष्य केवल मिट्टी का एक पुतला है जो नक़्शे तो बनाता है लेकिन ब्रह्मांड का असली मालिक इस नक़्शे को एक पल में मिटा सकता है। मानवीय बुद्धि की एक सीमा है, जहाँ बुद्धि सोचना बंद कर देती है वहाँ से नियति के फैसले शुरू होते हैं। तीसरा चरण: दोहराव और अंतिम फैसला युवा और भी तेज़ी से कहता है कि वह चैन से नहीं बैठेगा और समय की धारा से लड़ कर भी अपनी मेहनत से रेगिस्तान को दरिया में बदल देगा। इस पर बुजुर्ग अंतिम और निर्णायक प्रहार करते हुए कहते हैं कि बड़े-बड़े बादशाह और उनके ताज इसी नियति के सामने धूल में मिल गए। ब्रह्मांड का कण-कण प्रभु की मर्ज़ी से चलता है। तुम चाहे लाखों प्रयास कर लो, जीत हमेशा उसी फैसले की होती है जो तुम्हारे खून-ए-जिगर (भाग्य) पर लिख दिया गया है। चौथा चरण: समर्पण और नियति की जीत गीत के अंत में संगीत धीमा हो जाता है और युवा पर सच्चाई प्रकट हो जाती है। उसकी बुद्धि का घमंड टूट जाता है और उसकी आँखें नम हो जाती हैं। वह अपनी हार मानते हुए बुजुर्ग की बुद्धिमानी के सामने सिर झुका देता है और स्वीकार करता है कि मनुष्य की तदबीर चाहे जितनी मज़बूत हो, जीत हमेशा 'नियति' की ही होती है क्योंकि नियति दरासल अल्लाह पाक की रजा का दूसरा नाम है। ________________________________________ श्रोताओं के लिए एक पंक्ति का संदेश (पाठ): "सुनिए बुद्धि की शक्ति और नियति की बुद्धिमानी के बीच एक अनोखी और मुग्धकारी संगीत की प्रतियोगिता, जहाँ एक युवा का जोश, एक बुजुर्ग के सूफ़ियाना और गहरे सच के सामने सिर झुकाता है।"