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Leave Me — cover art

Song lyrics

Leave Me

📜 Lyrics

न जवाब दे न सवाल कर मुझे छोड़ दे मेरे हाल पर तुझे क्या मिलेगा? तू ही बता मुझे उलझनों में यों डाल कर न वह दिन रहे, न वह साल ही जो बचा तो जी का मलाल ही मुझे याद भी तू न आ सके तू ही ऐसा कोई कमाल कर कोई मसलहत थी त्याग में जो नहीं थी तू मेरे भाग में मेरी जुस्तजू, मेरी आरजू में तू यों न खुद को निढ़ाल कर तू रहे तो क्या? न रहे तो क्या मुझे अब तू कुछ भी कहे तो क्या नहीं अब मुझे सरोकार ही तू जिए कि अब तू विसाल कर यह मेरी अना पर है मुंहसर मैं जवाब दूँ कि न दूँ तुझे तुझे मुझ से हैं जो शिकायतें जो गिले हैं, जो भी सवाल कर मैं तो दोस्तों में बँटा रहा मैं आवारगी ही किया किया मेरी वालिदा..! तुझे क्या मिला मुझे पोस कर, मुझे पाल कर मुझे दिल दिया है यकीन से कहाँ लोग तुझ से हसीन से है यह दिल, नहीं कोई आईना जरा देख कर जरा भाल कर मुझे अपने पैरों से रौंद कर जरा देर को चका चाँद कर मुझे राख कर, मेरी खाक उड़ा मुझे क्या करेगा सँभाल कर जो मैं तंग हूँ तो बजंग हूँ कि तेरा ही रूप हूँ रंग हूँ जो भी हूँ मैं तुझ में सदा से हूँ मुझे फेंक खुद से निकाल कर मुझे फिर बना, मुझे फिर सजा कि लगूँ मैं खुद को नया नया नया रंग दे, नया रूप दे मुझे अपने आप में ढाल कर! मैं वह शख्स हूँ, तेरा अक्स हूँ जो तेरी रजा वह मेरी रजा तेरी खवाहिशें मेरी खवाहिशें मैं मजे में हूँ सभी टाल कर यह भला हुआ मैं नहीं रहा तू तो है सो तू तो रहे सदा मैं तो जा चुका मेरा जिक्र क्या मुझे भूल जा, न मलाल कर!

💡 Meaning & story

شاعری کی تشریح و تفہیم 1. آغاز: गरेज़ और बे-निआज़ी अशआर: (न जवाब दे न सवाल कर... मुझे उलझनों में यूँ डाल कर) तशरीह: कलाम का आग़ाज़ एक शदीद ज़हनी उलझन और बीज़ारी से होता है। शायर अपने मुख़ातब से कहता है कि अब बहस-ओ-तकरार का वक़्त गुज़र चुका। वह मज़ीद किसी ज़हनी कशमकश का मुतहम्मल नहीं हो सकता, इस लिए वह ख़ामोशी और तनहाई की दरख़ास्त कर रहा है। 2. माज़ी का मलाल और बे-हसी अशआर: (न वह दिन रहे, न वह साल ही... तू ही ऐसा कोई कमाल कर) तशरीह: यहाँ वक़्त के बदलने और जज़्बात के सर्द पड़ जाने का ज़िक्र है। शायर कहता है कि अब दिल में सिर्फ़ पछतावा बाक़ी है, और वह इस हद तक थक चुका है कि अब वह अपने महबूब या मुख़ातब को याद भी नहीं रखना चाहता। वह एक ऐसी 'कमाल' फ़रामोशी चाहता है जहाँ यादों का गुज़र न हो। 3. तक़दीर और जुस्तजू की थकन अशआर: (कोई मस्लिहत थी त्याग में... तू यूँ न ख़ुद को निढ़ाल कर) तशरीह: यह हिस्सा जुदाई की मंतिक़ बयान करता है। शायर का मानना है कि अगर वह एक दूसरे के मक़दर में नहीं थे, तो इस 'त्याग' (तर्क कर देने) में भी कोई बेहतरी रही होगी। वह मुख़ातब को समझाता है कि अब बे-हासिल आरज़ुओं में ख़ुद को हलकान करने का कोई फ़ायदा नहीं। 4. लातआल्लुकी का इज़हार (अना और सरवकार) अशआर: (तू रहे तो क्या? न रहे तो क्या... मैं जवाब दूँ कि न दूँ तुझे) तशरीह: इन अशआर में एक अजीब क़िस्म की ख़ुददारी और सर्द महरी है। शायर कहता है कि अब उसे इस बात से ग़रज़ नहीं कि दूसरा क्या कहता है या किस हाल में है। यहाँ पहुँच कर इंसान अपनी 'अना' के इस मुक़ाम पर होता है जहाँ वह दूसरों के सवालों और शिकायतों से बे-निआज़ हो जाता है। 5. इक़रार-ए-जुर्म और ख़राज-ए-तहसीन (वालिदा का ज़िक्र) अशआर: (मैं तो दोस्तों में बँटा रहा... मुझे पोस कर, मुझे पाल कर) तशरीह: यह कलाम का सब से जज़्बाती मोड़ है। शायर अपनी आवारा गर्दी और लापरवाई का इक़रार करता है कि इस ने ज़िंदगी बर्बाद कर दी। वह अपनी माँ की ममता और उन की क़ुरबानियों को याद कर के एक दुख का इज़हार करता है कि उन की महनत के बदले में इस ने क्या दिया? यह हिस्सा सामेईन के दिल को छू लेने वाला है। 6. आईना-ए-दिल और शिकस्तगी अशआर: (मुझे दिल दिया है यक़ीन से... मुझे क्या करेगा सँभाल कर) तशरीह: यहाँ शायर अपनी शिक़स्ता हाली को बयान कर रहा है। वह कहता है कि मेरा दिल कोई आईना नहीं जिसे सँभाल कर रखा जाए, बल्कि यह तो अब टूट कर राख हो चुका है। वह मुख़ातब से कहता है कि अब मुझे सँभालने की कोशिश न करो, बल्कि मेरी ख़ाक उड़ा दो। 7. फ़ना और बक़ा का फ़लसफ़ा अशआर: (जो मैं तँग हूँ तो बजँग हूँ... मुझे फ़ेंक ख़ुद से निकाल कर) तशरीह: शायर ख़ुद को अपने मुख़ातब (या ख़ालिक़) का ही एक अक्स क़रार देता है। वह कहता है कि मेरा वुजूद तुम ही से है, चाहे मैं किसी भी हाल में हूँ। यहाँ इंसान की अपनी हस्ती मिटाने की तड़प ज़ाहिर होती है। 8. नया जनम और मुकम्मल तबदीली अशआर: (मुझे फिर बना, मुझे फिर सजा... मुझे अपने आप में ढाल कर!) तशरीह: यह एक दुआ और इलतिजा है। शायर अपनी पुरानी शख़्सियत से बीज़ार हो कर एक नई ज़िंदगी, नया रूप और नया रँग माँग रहा है। वह चाहता है कि उसे दोबारा से तख़लीक़ किया जाए ताकि वह ख़ुद को 'नया' महसूस कर सके। 9. अख़्तिताम: तस्लीम-ओ-रज़ा अशआर: (मैं वह शख़्स हूँ, तेरा अक्स हूँ... मुझे भूल जा, न मलाल कर!) तशरीह: कलाम का अख़्तिताम अंतहाई ख़ूबसूरत है। शायर अपनी मर्जी को अपने महबूब या ख़ालिक़ की मर्जी में ज़मा कर देता है। वह अपनी हस्ती को मुकम्मल तौर पर नफ़ी (ख़ारिज) कर देता है और कहता है कि "मैं" तो अब रहा ही नहीं, सिर्फ़ "तू" बाक़ी है। इस लिए मेरे जाने का कोई दुख न किया जाए।