💡 Meaning & story
تعारف اور पस منظر
हफीज़ जालंधरी उर्दू साहित्य का एक मान्य नाम हैं, जिन्हें 'शायरे इस्लाम' और 'खालिक तराने पाकिस्तान' के रूप में जाना जाता है। इनकी यह नज़्म इनके विशेष रोमानवी और शोखियत के रंग की झलक दिखाती है। इस नज़्म में एक ओर तो इश्क़ व मुहब्बत की शोखी है और दूसरी ओर इंसानी वक़ार और आत्मसम्मान का पहलू भी नुमायां है।
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नज़्म की मुकम्मल तशरीह
शेर 1
दिल अभी तक जवां है प्यारे किस मुसीबत में जां है प्यारे तू मेरे हाल का खयाल न कर इसमें भी एक शान है प्यारे
तशरीह: शायर कहता है कि अगरचे उम्र गुज़र गई लेकिन दिल की तमन्नाएं और जज़्बे अब भी जवां हैं। मगर यह जवानी एक मुसीबत बन गई है क्योंकि उम्र के इस हिस्से में इश्क़ निभाना मुश्किल काम है। अगले मिसरे में वह अपनी खुद्दारी ज़ाहिर करते हुए महबूब से कहता है कि मेरी ख़स्ता हाली पर तरस खाने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि मुहब्बत में मिलने वाला दुःख भी मेरे लिए एक इज़्ज़त और शान की बात है।
शेर 2
तलख़ कर दी है ज़िंदगी जिसने कितनी मीठी ज़बान है प्यारे वक़्त कम है न छेड़ हिज्र की बात यह बड़ी दास्तां है प्यारे
तशरीह: यहां शायर महबूब के तज़ाद को बयां कर रहा है कि जिसकी बातों में शहद जैसी मिठास है, उसी के रवैये ने मेरी ज़िंदगी तलख़ कर दी है। दूसरे शेर में वह कहता है कि जुदाई का क़िस्सा इतना लंबा है कि इसे सुनाने के लिए वक़्त बहुत कम है, इसलिए इस दुःख भरी दास्तां को रहने ही दो।
शेर 3
जाने क्या कह दिया था रोज़े अज़ल आज तक इम्तहां है प्यारे हम हैं बंदे मगर तेरे बंदे यह हमारी भी शान है प्यारे
तशरीह: 'रोज़े अज़ल' से मुराद तखलीक़े कायनात का पहला दिन है। शायर कहता है कि न जाने उस दिन हमने इश्क़ का क्या वादा कर लिया था कि इसकी आज़मायश आज तक खत्म होने में नहीं आ रही। मज़ीद कहता है कि हम अल्लाह के बंदे तो हैं ही, लेकिन दुनिया में तेरी निस्बत से पहचाने जाते हैं और तेरे इश्क़ का असीर होना भी हमारे लिए एक फ़ख़्र की बात है।
शेर 4
कब कहा मैंने इश्क़ का दावा तेरा अपना गुमां है प्यारे मैं तुझे बेवफ़ा नहीं कहता दुश्मनों का बयां है प्यारे
तशरीह: इस शेर में हफीज़ जालंधरी ने कमाल की शोखी दिखाई है। वह महबूब से कहते हैं कि मैंने तो कभी नहीं कहा कि मैं तुमसे इश्क़ करता हूं, यह तुम्हारा अपना वहम या ख़याल हो सकता है। इसी तरह वह बड़ी खूबसूरती से महबूब को बेवफ़ा भी कह देते हैं और इल्ज़ाम दूसरों पर डाल देते हैं कि लोग तुम्हें बेवफ़ा कहते हैं, मैं तो ऐसा नहीं कहता।
शेर 5
सारी दुनिया को है ग़लतफ़हमी मुझ पर तो महरबां है प्यारे तेरे कोचे में है सुकून वर्ना हर ज़मीन आसमां है प्यारे
तशरीह: दुनिया समझती है कि महबूब मुझ पर बड़ा करम फ़रमा है, मगर हक़ीक़त में यह सिर्फ लोगों की ग़लतफ़हमी है (यानी असल सूरतेहाल इसके बरअक्स है)। शायर कहता है कि मुझे सुकून सिर्फ तुम्हारी गली में मिलता है, वर्ना इस दुनिया में हर जगह परेशानियां और बेचैनी ही फैली हुई है।
शेर 6
खैर फ़रियाद बेअसर ही सही ज़िंदगी का निशां है प्यारे शर्म है इहतिराज़ है क्या है परदा सा दर्मियां है प्यारे
तशरीह: अगरचे मेरी आहें और फ़रियादें महबूब पर कोई असर नहीं करतीं, लेकिन यही फ़रियादें इस बात का सुबूत हैं कि मैं अभी ज़िंदा हूं। वह महबूब की ख़ामोशी और दूरी पर सवाल करता है कि यह तुम्हारी शर्म है या मुझसे दूरी इख़्तियार करने की कोशिश, जो हमारे दर्मियां एक अंजाना सा परदा क़ायम है।
मक़ता (आख़िरी हिस्सा)
अर्ज़े मतलब समझ के हो न ख़फ़ा यह तो एक दास्तां है प्यारे जंग छिड़ जाए हम अगर कह दें यह हमारी ज़बां है प्यारे
तशरीह: शायर कहता है कि मेरी बातों का बुरा न मानना, मैं सिर्फ एक क़िस्सा सुना रहा था। आख़िर में वह अपनी शायरी और ज़बान की काट का ज़िक्र करते हुए कहता है कि अगर हम अपनी असल हक़ीक़त या सच्चाई बयां करने पर आ जाएं, तो ज़माने में एक तूफ़ान या जंग छिड़ जाए, क्योंकि हमारी ज़बान में बहुत असर है।
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