Farooq Music Lyrics & Meaning
← All songs
Bhoole Hue Gham — cover art

Song lyrics

Bhoole Hue Gham

📜 Lyrics

दिल में अब यूँ तेरे भुलाए हुए ग़म आते हैं जैसे बिछड़े हुए काबे में सनम आते हैं एक एक कर के होते जाते हैं तारे रोशन मेरी मंजिल की तरफ तेरे क़दम आते हैं रक़्स-ए-मय तेज़ करो, साज़ की लय तेज़ करो सूए-ए-मय-ख़ाना सफ़ीरान-ए-हरम आते हैं कुछ हमें को नहीं इहसान उठाने का दिमाग़ वो तो जब आते हैं माइल-ब-करम आते हैं और कुछ देर न गुज़रे शब-ए-फुरक़त से कहो दिल भी कम दुखता है वो याद भी कम आते हैं मसलहत छुपती है अब चेहरा-ए-गीती के तले हरफ़-ए-हक़ कहने जो निकलें तो सितम आते हैं अब कोई शमा जलाए न सर-ए-राह-ए-वफ़ा तीरगी बाँटने अब अहल-ए-चमन आते हैं वही वहशत, वही सहरा, वही तारीकी-ए-शब फिर से हम राह-ए-जुनूँ याद क़दम आते हैं रक़्स-ए-मय तेज़ करो, साज़ की लय तेज़ करो सूए-ए-मय-ख़ाना सफ़ीरान-ए-हरम आते हैं कौन सुनता है यहाँ शाम-ए-ग़रीबाँ का दुख लब पे अफ़साने तो सब के ही रक़म आते हैं फिर से इक अंजुमन-ए-नाज़ सजाई जाए आज फिर बज़्म में कुछ सोख़्ता-दम आते हैं दिल में अब यूँ तेरे भुलाए हुए ग़म आते हैं...

💡 Meaning & story

शीर्षक: दिल में अब यूँ तेरे भूले हुए ग़म आते हैं - मुकम्मल ग़ज़ल परिचय: यह ग़ज़ल उर्दू शायरी के क्लासिक रंग और आधुनिक احساसात का एक हसीन इम्तिज़ाज़ है। फैज़ अहमद फैज़ के मख़सूस लब व लहजे को बरक़रार रखते हुए, इस ग़ज़ल में इंसानी जज़्बात, जुदाई का करब, मुसलिहतों के अंधेरे और उम्मीद की किरनों को अशआर की सूरत में ढाला गया है। इस वीडियो में हर शेर की गहरी मअनविअत और इसके पीछे छिपे फ़लसफ़े को बयान किया गया है। ________________________________________ शेर की तशरीह शेर 1: दिल में अब यूँ तेरे भूले हुए ग़म आते हैं जैसे बिछड़े हुए काबे में सनम आते हैं तशरीह: इस शेर में महबूब की यादों को पुराने बुतों से तशबीह दी गई है जो किसी मुक़द्दस मक़ाम में लौट आएँ। ये यादें अब तकलीफ़ नहीं देतीं बल्कि एक पुरानी शनाख़्त के अहसास के साथ दिल में आती हैं। शेर 2: एक एक कर के हुए जाते हैं तारे रोशन मेरी मंज़िल की तरफ़ तेरे क़दम आते हैं तशरीह: जैसे रात के वक़्त तारे चमक कर अंधेरा ख़त्म करते हैं, वैसे ही महबूब की आमद की उम्मीद शायर के दिल में रोशनी फैला रही है और उसे लग रहा है कि उसकी मंज़िल क़रीब आ रही है। शेर 3: रक़्स-ए-मै तेज़ करो साज़ की लै तेज़ करो सूए मै-ख़ाना सफ़ीरानِ हरम आते हैं तशरीह: यह एक तंज़ियाह शेर है कि वह लोग जो ज़ाहिर में बहुत पारसा हैं, वह भी छिप छिप कर सुकून की तलाश में मै-ख़ाने का रुख़ कर रहे हैं। शेर 4: कुछ हमें को नहीं एहसान उठाने का दिमाग़ वह तो जब आते हैं मायिल-ब-करम आते हैं तशरीह: शायर अपनी ख़ुददारी बयान कर रहा है कि वह किसी का एहसान नहीं लेना चाहता, लेकिन महबूब की शफ़क़त ऐसी है कि वह जब भी मिलता है, अपनी नवाज़िशों से नवाज़ देता है। शेर 5: और कुछ देर न गुज़रे शब-ए-फ़िरक़त से कहो दिल भी कम दुखता है वह यादें भी कम आते हैं तशरीह: जुदाई की तवालत अब आदत बन चुकी है। अब न दिल पहले जैसा धड़कता है और न महबूब की यादें पहले जैसी तड़पाती हैं। यह एक तरह की जज़्बाती बे-हसी का इज़हार है। शेर 6: मुसलिहत छिपती है अब चेहरा-ए-गीती के तले हर्फ़-ए-हक़ कहने जो निकलें तो स्तम आते हैं तशरीह: इसमें ज़माने की सच्चाई है कि अब दुनिया में सच बोलना मुश्किल हो गया है। जो भी हक़ की बात करता है, उसे ज़ुल्म व स्तम का सामना करना पड़ता है। शेर 7: अब कोई शमा जलाए न सरِ राहِ वफ़ा तीरगी बांटने अब अहलِ चमन आते हैं तशरीह: जब चमन के मुहाफ़िज़ ही अंधेरे फैलाने लगें, तो वफ़ा की राह में रोशनी की उम्मीद रखना फ़ज़ूल है। यह सामाजी बे-वफ़ाई की अक़ासी है। शेर 8: वही वहशत, वही सहरा, वही तारीकीِ शब फिर से हम राहِ जुनून यादे क़दम आते हैं तशरीह: इश्क़ का जुनून जब दोबारा सर उठाता है, तो वही पुरानी वहशतें और तन्हाइयाँ इंसान को घेर लेती हैं। पुराने रास्ते दोबारा मानूस लगने लगते हैं। शेर 9: कौन सुनता है यहाँ शाम-ए-ग़रीबाँ का दुख लब पे अफ़्सानें तो सब के ही रक़म आते हैं तशरीह: दुनिया में हर शख़्स अपनी कहानी सुनाने के लिए तो तैयार है, लेकिन किसी के पास दूसरों के हक़ीक़ी दर्द को समझने और सुनने की महलत नहीं है। शेर 10: फिर से इक अंजुमनِ नाज़ सजाई जाए आज फिर बज़्म में कुछ सोख़्ता-दम आते हैं तशरीह: महफ़िल को दोबारा सजाने की बात हो रही है क्योंकि अब वह लोग आ रहे हैं जो ज़िंदगी के तलख़ तजुर्बों से गुज़र कर आए हैं और जिनके पास दर्द का ख़ज़ाना है।