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The price of dying — cover art

Song lyrics

The price of dying

📜 Lyrics

मरने की अदा और है, जीने की अदा और जो चाहूँ समझना भी तो रोके है अना और कुछ सोच के क़दमों को न दी हम ने भी जुंबिश इल्ज़ाम न रख जाए कहीं फिर से हवा और जब से मैं अकाई का इल्म ले के चला हूँ इहसास यह होता है जुदा होने लगा और कभी जो खुद से मिलने की तम्मना जागती है तो रास्ता रोक लेती है मेरी ही अना और यह दुनिया जिस को कहती है मेरी जीत का सूरज बढ़ा देती है मेरे क़द का यह साया और तकमील की मंज़िल ही मेरी राहे फना है क्यूँ मुझ को दिखाते हो यहाँ राहे बक़ा और खिरद के दायरों में क़ैद हो कर रह गया हूँ दिखा ए इश्क़ मुझ को अब कोई रास्ता और मेरी तिशनह लबी का अब कोई पुरसाँ नहीं है पिलादो अपनी आँखों से मुझे इक बादा और यह सोच के करता नहीं तूफ़ान का तेाक़ुब मुमकिन है बदल जाए ज़मानों की हवा और हुई है ख़त्म इक ताज़ा मुसीबत तो क्या हुआ अभी है सामने दीवारे ग़म इक और और यह कौन सी मंज़िल है कि मुठ्ठी नहीं खुलती है जब कि मेरे सामने इक काली बला और

💡 Meaning & story

غزल की व्यापक व्याख्या और समझ यह ग़ज़ल मानवीय मनोविज्ञान, आत्मज्ञान (Self-discovery) और आध्यात्मिक यात्रा की एक सुंदर कहानी है। इसमें "अहम्" (Ego) को एक ऐसी बाधा के रूप में दिखाया गया है जो मनुष्य को सच्चाई तक पहुंचने से रोकती है। पहला भाग: अहम् और सामाजिक संघर्ष • मरने का ढंग और है, जीने का ढंग और... कवि जीवन और मृत्यु के प्रचलित तरीकों से हट कर एक नए ढंग की बात कर रहा है। वह कहता है कि मैं सच्चाई को समझना तो चाहता हूँ, लेकिन मेरा अपना "अहम्" एक पर्दा बन कर मेरे सामने खड़ा हो जाता है। • कुछ सोच कर कदमों को हम ने भी गति न दी... यहाँ समय की अविश्वसनीयता का ज़िक्र है। कवि रुक गया है, इस डर से नहीं कि वह थक गया है, बल्कि इस भय से कि कहीं यह निर्दयी समय उसे फिर से किसी नए आरोप या अपमान का निशाना न बना दे। दूसरा भाग: आत्मज्ञान और व्यक्तित्व • जब से मैं एकता का ज्ञान ले कर चला हूँ... यह पंक्ति व्यक्तित्व और एकेश्वरवाद की यात्रा को बयान करती है। जब मनुष्य सत्य के रास्ते (एकता) को चुन लेता है, तो उसे तीव्रता से अनुभव होता है कि वह भौतिक दुनिया और सामान्य लोगों से कितना अलग और अकेला हो गया है। • कभी जो अपने से मिलने की चाहत जागती है... मनुष्य जब अपने अंदर झाँकने की कोशिश करता है, तो उसका "अहम्" एक बार फिर रास्ते की दीवार बन जाता है। यह अपने से अपनी मुलाक़ात में सबसे बड़ी बाधा है। • यह दुनिया जिसे कहती है मरी जीत का सूरज... सांसारिक सफलताओं पर एक गहरा व्यंग्य है। कवि कहता है कि जिसे दुनिया मेरी "विजय" समझ रही है, वह दरअसल मेरे अहम् और घमंड के साए को और लंबा कर रही है, जो मुझे मेरी वास्तविकता से दूर कर देता है। तीसरा भाग: फना, बक़ा और प्रेम की यात्रा • पूर्णता की मंज़िल ही मरा रास्ता फना है... यहाँ सूफ़ीवाद का रंग प्रबल है। कवि के निकट मानवीय कमाल इसी में है कि वह अपने को मिटा दे (फना हो जाए)। वह उन लोगों से विरक्त है जो उसे सांसारिक अमरता या हमेशा जीवित रहने के व्यर्थ पाठ पढ़ाते हैं। • बुद्धि के दायरों में क़ैद हो कर रह गया हूँ... विवेक (बुद्धि) मनुष्य को तर्क के दायरों में उलझाए रखती है। कवि थक चुका है और अब "प्रेम" से विनती करता है कि उसे कोई ऐसा रास्ता दिखाए जहाँ बुद्धि की क़ैद न हो। • मरी प्यास की अब कोई सुनने वाला नहीं है... प्यास (तलाश) की तीव्रता इतनी अधिक है कि अब साधारण साधनों से संतुष्टि संभव नहीं, उसे अब किसी आध्यात्मिक अनुग्रह (प्रेम की शराब) की आवश्यकता है। चौथा भाग: साहस और अंतिम सत्य • यह सोच कर नहीं करता तूफ़ान का पीछा... कवि कायर नहीं है, बल्कि वह परिस्थितियों की नाज़ुकता को समझता है। वह जानता है कि कभी-कभी चुप्पी ही सर्वश्रेष्ठ प्रतिक्रिया होती है, क्योंकि समय की हवा किसी भी पल दिशा बदल सकती है। • हुई है ख़त्म एक नई मुसीबत तो क्या हुआ... ज़िंदगी निरंतर परीक्षा का नाम है। एक दुःख ख़त्म होता है तो दूसरा सामने खड़ा हो जाता है (दुःख की दीवार)। यह पंक्ति मनुष्य को निरंतरता का पाठ देती है। • यह कौन सी मंज़िल है कि मुट्ठी नहीं खुलती... ग़ज़ल का मक़ता (अंतिम शेर) एक शक्तिशाली जिज्ञासा पर ख़त्म होता है। मनुष्य मंज़िल के क़रीब तो है लेकिन उसका हाथ अभी तक बंद है (शायद दुनिया के प्रेम या डर की वजह से) और सामने एक बहुत बड़ा अनजाना भय (काली विपत्ति) उसकी प्रतीक्षा कर रहा है।