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Pursuit of opportunity — cover art

Song lyrics

Pursuit of opportunity

📜 Lyrics

यूँ वक़्त गुज़रता है फ़रसत की तमन्ना में जिस तरह कोई पत्ता बहता हुआ दरिया में साहिल के क़रीब आ कर चाहे कि ठहर जाऊँ और सैर ज़रा कर लूँ इस इक़्स मुशज्जर की जो दामन दरिया पर ज़ीबाइश दरिया है या बाद का वह झोंका जो वक़्फ़ रवानी है एक बाग़ के गोशे में चाहे कि यहाँ दम लूँ दामन को ज़रा भर लूँ इस फूल की ख़ुशबू से जिसको अभी खिलना है फ़रसत की तमन्ना में यूँ वक़्त गुज़रता है अफ़्कार मईशत के फ़रसत ही नहीं देते मैं चाहता हूँ दिल से कुछ कसब हुनर कर लूँ गुलहाए मज़ामीन से दामान सख़न भर लूँ है बख़्त मगर वाज़ूँ फ़रसत ही नहीं मिलती फ़रसत को कहाँ ढूँढोँ फ़रसत ही का रोना है फिर जी में यह आती है कुछ ऐश ही हासिल हो दौलत ही मिले मुझ को वह काम कोई सोचूँ फिर सोचता यह भी हूँ यह सोचने का धंधा फ़रसत ही में होना है फ़रसत ही नहीं देते अफ़्कार मईशत के

💡 Meaning & story

हफीज जालंधरी की यह नज़्म "फुरसत की तमन्ना" इंसानी ज़िंदगी के एक अबदी मसीबत की झलक दिखाती है: यानी "वक़्त की कमी और मालियाती बोझ"। हफीज जालंधरी अपनी वतन प्रेम और जंगी शायरी (शाहनामा इस्लाम) के लिए मशहूर हैं, लेकिन इस नज़्म में वह एक आम इंसान के दिल की धड़कन और उसकी रोज़मर्रा की कशमकश को बयां कर रहे हैं। आप अपने श्रोताओं के लिए इसकी व्याख्या और पृष्ठभूमि इन बातों की रोशनी में बयां कर सकते हैं: १. केंद्रीय विचार (The Core Theme) इस नज़्म का मरकज़ी विचार "तज़ाद" है। एक तरफ इंसान का नाज़ुक ज़ायक़ा, खूबसूरती की तमन्ना और कुछ बड़ा रचने का शौक़ है, और दूसरी तरफ "रोज़ी-रोटी की चिंता" की ज़ंजीरें हैं। शायर यह कहना चाहता है कि इंसान वक़्त के नदी में एक छोटे पत्ते की तरह मजबूर है जो ठहरना तो चाहता है मगर बहाव उसे ले जाता है। २. बंद दर बंद व्याख्या (Detailed Explanation) • वक़्त की बेरहमी: शायर कहता है कि ज़िंदगी इस पत्ते की तरह है जो लहरों की दया पर है। वह किनारे पर मौजूद खूबसूरत दरख़्तों की छाया को देख कर वहाँ थोड़ी देर ठहरना और फितरत का मुशाहदा करना चाहता है, मगर ज़िंदगी की रवानी उसे मौक़ा नहीं देती। • सृजनात्मक प्यास: "कुछ कला का काम कर लूँ, सुंदर विचारों से" के ज़रिये शायर बताता है कि उसका जी चाहता है कि वह शायरी करे, कला रचे या कोई ऐसा काम करे जो हमेशा यादगार रहे, लेकिन उसे "फुरसत" ही नहीं मिलती। • आर्थिक बोझ (The Financial Struggle): यहाँ नज़्म का सबसे अहम मोड़ आता है। शायर इक़रार करता है कि "रोज़ी-रोटी की चिंता" यानी पैसे कमाने और घर चलाने की फिक्र उसे आज़ाद नहीं होने देती। यह हर दौर के इंसान का दुख है कि उसे पेट भरने के लिए अपने शौक क़ुरबान करने पड़ते हैं। • एक अजीब दायरा (The Paradox): नज़्म का अंत एक गहरी बात पर होता है। शायर सोचता है कि अगर वह कोई बड़ा काम करे या दौलत कमाए ताकि उसे सुकून मिले, तो वह महसूस करता है कि इस "बड़े काम" को सोचने के लिए भी तो सुकून और फुरसत चाहिए जो उसके पास है ही नहीं। यह एक न ख़त्म होने वाला चक्र बन जाता है। ________________________________________ ३. यह नज़्म क्यों लिखी गई? (The Reason) हफीज जालंधरी ने यह नज़्म उन हालात में लिखी जब भारतीय उपमहाद्वीप में औद्योगिक दौर और भौतिक उन्नति का आग़ाज़ हो रहा था और इंसान मशीन बनता जा रहा था। इसके लिखने की वजहें निम्नलिखित हो सकती हैं: 1. इंसानी बेबसी का इज़हार: वह दिखाना चाहते थे कि इंसान कितना ही ज़हीन क्यों न हो, भौतिक ज़रूरतें उसे क़ैदी बना लेती हैं। 2. कलाकार की त्रासदी: एक फ़नकार (शायर या अदीब) हमेशा यह महसूस करता है कि उसके पास वक़्त कम है और कहने को बातें ज़्यादा। यह नज़्म इसी आंतरिक बेचैनी का परिणाम है। 3. संतुलन की तलाश: यह नज़्म हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम सिर्फ काम करने के लिए पैदा हुए हैं या ज़िंदगी की खूबसूरती (फूलों की खुशबू और दरख़्तों की छाया) को महसूस करना भी हमारा हक़ है? 4. श्रोताओं के लिए संदेश यह नज़्म सिर्फ हफीज जालंधरी की नहीं बल्कि हम सब की कहानी है। आज के डिजिटल दौर में जहाँ हम हर वक़्त काम में मशगूल हैं, यह नज़्म हमें याद दिलाती है कि हमारी रूह को भी "फुरसत" की ज़रूरत है ताकि वह "सुंदर विचारों" से अपना दामन भर सके। यह नज़्म फ़नी लिहाज़ से "आधुनिक नज़्म" की बेहतरीन मिसाल है जिसमें क़ाफ़िया और ردیف की पाबंदी के बग़ैर भी एक जादुई रवानी मौजूद है।