Farooq Music Lyrics & Meaning
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Only Pray — cover art

Song lyrics

Only Pray

📜 Lyrics

कोई चारा नहीं दुआ के सिवा कोई सुनता नहीं खुदा के सिवा मुझ से क्या हो सका वफा के सिवा मुझ को मिलता भी क्या सजा के सिवा कोई राजी न रह सका मुझ से मेरे अल्लाह तेरी रजा के सिवा कोई चारा नहीं दुआ के सिवा कोई सुनता नहीं खुदा के सिवा दरे यार पर यह झुकी जबीं न कहीं झुकी सजदागाह के सिवा वह अजीब अदल की राह है वहां कुछ नहीं है गवाह के सिवा जिसे ढूंढती है तेरी नजर वह मिलेगा दिल की पनाह के सिवा मेहर ओ माह से बुलंद हो कर भी नजर आया न कुछ खला के सिवा यह जो तेरगी है हयात की न मिटेगी नूरे नगाह के सिवा बुत कदे से चले हो काबे को क्या मिलेगा तुम्हें खुदा के सिवा अपनों के यह मखलसाना तीर कुछ नहीं मेरी ही खता के सिवा ए हफीज आह आह पर आखिर क्या कहीं दोस्त वाह वा के सिवा दुआ के सिवा... खुदा के सिवा... सिवा

💡 Meaning & story

محمद फारूक द्वारा पुनर्लेखित और रचित नज़्म का मतलब और व्याख्या: "दुआ के सिवा कोई चारा नहीं" यह कलाम उर्दू के महान शायर अबुलअसर हफीज़ जालंधरी की रचना है, जिसमें उन्होंने बंदगी, असहायता और अल्लाह की एकमात्र हस्ती पर भरोसे को बेहद प्रभावी तरीके से बयां किया है। मूल विचार: इस नज़्म का बुनियादी संदेश यह है कि दुनिया की हर आस और हर सहारा अस्थायी है। जब इंसान अपनी तमाम कोशिशों में नाकाम हो जाता है या अपनों की बेवफाई का शिकार हो जाता है, तो उसे सिर्फ एक ही दरवाज़ा ऐसा मिलता है जहां से कोई खाली हाथ नहीं लौटता, और वह है "अल्लाह का दरवाज़ा"। अशआर की मختसर व्याख्या: * तवक्कुल और बंदगी: शायर का मानना है कि जब तमाम रास्ते बंद हो जाएं तो दुआ ही वह अकेला रास्ता है जो चमत्कार दिखाता है। अल्लाह के सिवा कोई ऐसा नहीं जो इंसान के दिल की हालत से वाकिफ हो या उसकी पुकार सुने। * दुनिया की हक़ीक़त: इंसान अपनी तरफ से वफा की हर हद पार कर लेता है, लेकिन दुनिया उसे बदले में अक्सर दुःख और सज़ा ही देती है। यहां तक कि वे 'अपने' जिन पर इंसान सबसे ज़्यादा भरोसा करता है, उनके तंज़ और रवैये तीर बनकर दिल को घायल करते हैं। * हक़ीक़ी मंज़िल: साहिलِ मुराद (कामयाबी) सिर्फ उसी को मिलती है जो खुदा को अपना मल्लाह (नाविक) मान ले। मंज़िल पर पहुंचकर यह राज़ खुलता है कि रास्ते में जितने भी रहनुमा नज़र आए, वे दरअसल इसी एक ख़ालिक़ के इशारे पर काम कर रहे थे। * तस्लीम और रज़ा: दुनिया को खुश करना एक नामुमकिन काम है। असली सुकून तब मिलता है जब इंसान दुनिया की नाराज़गी की परवाह किए बिना सिर्फ अपने रब की खुशी में राज़ी हो जाए। * ख़ालिक़ की अज़मत: इंसान कायनात की जितनी भी बुलंदियों (सूरज और चांद) तक पहुंच जाए, उसे आखिरकार यह एहसास होता है कि अल्लाह की ज़ात के बिना सब कुछ एक खालीपन है, एक अधूरापन है। * दर्दِ दिल और दुनिया का ردِعمल: मक़ता में शायर की एक कड़वी हक़ीक़त बयां हुई है कि जब कोई फनकार या इंसान अपने दुःख को "आह" की सूरत में बयां करता है, तो दुनिया उसे "वाह वाह" (तारीफ) में उड़ा देती है, यानी लोग फन की तारीफ तो करते हैं मगर फनकार के दर्द को नहीं समझते। नतीजा: यह नज़्म एक पुकार है, एक दुआ है और एक ऐसा इक़रार है जो इंसान को घमंड से निकालकर अल्लाह की मुहब्बत के क़रीब कर देता है।