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Age Of Time — cover art

Song lyrics

Age Of Time

📜 Lyrics

समय की उम्र क्या बड़ी होगी इक तेरे वसल की घड़ी होगी दस्तकें दे रही है पलकों पर कोई बरसात की झड़ी होगी क्या खबर थी कि नोक ख़नजर भी फूल की एक पंखुड़ी होगी ज़ुल्फ़ बल खा रही है माथे पर चाँदनी से सबा लड़ी होगी ऐ अदम के मुसाफिरो होशियार राह में ज़िंदगी खड़ी होगी क्यों गिरह गेसुओं में डाली है जाँ किसी फूल की उड़ी होगी इलतजा का मलाल क्या कीजे उन के दर पर कहीं पड़ी होगी मौत कहते हैं जिस को ऐ साग़रؔ ज़िंदगी की कोई कड़ी होगी

💡 Meaning & story

साग़र सिद्दीक़ी साहब का यह कलाम उर्दू शायरी के चंद बेहतरीन इंतख़ाब में से एक है। इस ग़ज़ल में जो रवानी, तग़ज़्ज़ुल और सूफ़ियाना रंग है, वह साग़र ही का ख़ासा है। आपने बहुत ख़ूबसूरत अशआर यहाँ शेयर किए हैं। इस ग़ज़ल के हर शेर में एक अलग कायनात पोशीदा है, लेकिन कुछ अशआर अपनी गहराई की वजह से लाफ़ानी हो चुके हैं: अशआर की मुख़्तसर तश्रीह और ख़ूबी: • वक़्त और वस्ल का तक़ाबुल: वक़्त की उम्र क्या बड़ी होगी एक तेरे वस्ल की घड़ी होगी पहले ही शेर में वक़्त जैसी लामतनाही हक़ीक़त को महबूब के साथ बीते हुए एक लम्हे के सामने हीच (छोटा) कर दिया गया है। यह इश्क़ की वह इंतहा है जहाँ कायनात के सारे पैमाने बदल जाते हैं। • मंज़र-कशी और जमालियात: ज़ुल्फ़ बल खा रही है माथे पर चाँदनी से सबा लड़ी होगी यह शेर साग़र की तख़य्यालाती क़ुव्वत का मुँह बोलता सबूत है। सबा (हवा) और चाँदनी के दरमियान 'लड़ाई' को ज़ुल्फ़ों के बल खाने की वजह बताना एक अछूती तशबीह है। • इंतबाह और फ़लसफ़ा: ऐ अदम के मुसाफ़िरो होशियार राह में ज़िंदगी खड़ी होगी आम तौर पर लोग ज़िंदगी से मौत (अदम) की तरफ़ जाने से डरते हैं, लेकिन साग़र यहाँ उलटी बात कर रहे हैं। वह अदम के मुसाफ़िरों को 'ज़िंदगी' से होशियार कर रहे हैं, जो इस बात की तरफ़ इशारा है कि असल आज़माइश और दुख ज़िंदगी में हैं, मौत में नहीं। • ज़िंदगी और मौत का रिश्ता (मक़्ता): मौत कहते हैं जिसको ऐ साग़रؔ ज़िंदगी की कोई कड़ी होगी यह मक़्ता इंसान के ख़ौफ़-ए-मर्ग को ख़त्म कर देता है। मौत को ज़िंदगी से अलग कोई शै समझने के बजाय, इसे इसी तसलसुल की एक 'कड़ी' क़रार देना एक बहुत बड़ा फ़िक्री मक़ाम है। फ़नी महासिन: इस ग़ज़ल में तरन्नुम बहुत नमायाँ है। अलफ़ाज़ का चुनाव ऐसा है कि पढ़ते हुए एक ख़ास मौसीक़ी का एहसास होता है। "फूल की पंखड़ी", "बरसात की झड़ी", और "गीसुओं में गिरह" जैसे अलफ़ाज़ ग़ज़ल के हुस्न को दोबाला कर रहे हैं। साग़र सिद्दीक़ी की ज़िंदगी ख़ुद एक मुसीबत थी, लेकिन इनके कलाम में जो मिठास और गहराई है, वह इन्हें उर्दू अदब में हमेशा ज़िंदा रखे गी।