📜 Lyrics
धरती की धड़कन, हवा का साज़
उठो कि अब है मिलन का आग़ाज़
न सरहदें हैं, न कोई दूरी
यह रक़्स-ए-हयात है, सब से ज़रूरी
आओ! साथ मिलकर क़दम बढ़ाएँ
आओ! दुनिया को झूम के सुनाएँ
यह साज़-ए-वफ़ा, यह ताल-ए-जहाँ
सब एक हैं यहाँ, सब एक हैं यहाँ
यह रक़्स-ए-हयात, यह जोश-ए-जुनूँ
हर दिल में बसा है एक सुकूँ
मौसीक़ी की लहरों पे बहते चलें
मुहब्बत की सब से ही कहते चलें
हर रंग में छुपी है एक ही लहर
यह प्यार की ख़ुशबू, यह अमन की सहर
सितारों से आगे है अपनी उड़ान
मौसीक़ी की ज़बान है सब की ज़बान
दिलों की तड़प को आवाज़ बना दो
ख़ामोशी को अब तुम साज़ बना दो
चलो कि सजी है यह महफ़िल-ए-दौराँ
हर लम्हा है अब तो रक़्स-ए-जहाँ
यह रक़्स-ए-हयात, यह जोश-ए-जुनूँ
हर दिल में बसा है एक सुकूँ
मौसीक़ी की लहरों पे बहते चलें
मुहब्बत की सब से ही कहते चलें
देखो यह दुनिया एक मेला है
कोई न यहाँ अब अकेला है
हाथों में हाथ थामे रहो
उम्मीद का नग़्मा गाते रहो
सब एक हैं यहाँ, सब एक हैं यहाँ
सब एक हैं यहाँ, सब एक हैं यहाँ
💡 Meaning & story
नज़्म का सारांश: "रक़्स-ए-हयात"
"यह नज़्म कायनात की इसी हम-आहंगी और संगीत के नाम है जो हमें सरहदों, रंगों और नस्लों से बालातर होकर एक डोरी में पिरोती है। 'रक़्स-ए-हयात' महज़ एक नृत्य नहीं, बल्कि शांति, मुहब्बत और वैश्विक भाईचारे का वह संदेश है जो संगीत की ज़बान में दिलों को जोड़ता है। इसमें यह संदेश छिपा है कि जब हम मिलकर शांति की ताल पर क़दम बढ़ाते हैं, तो पूरी दुनिया एक ख़ूबसूरत महफ़िल बन जाती है।"
"संगीत की ज़बान, सब की ज़बान। 'रक़्स-ए-हयात' एक ऐसी पुकार है जो दुनिया को मुहब्बत और इत्तिहाद के तालों पर झूमने की दावत देती है।"