💡 Meaning & story
जॉन एलिया 1931 - 2002 - संगीत और शैली - मुहम्मद फारूक
जॉन एलिया के कलाम की तीसरी बड़ी खूबी और इसकी गहराई दरअसल इस 'मनोवैज्ञानिक विरोधाभास' में छिपी है जो आपने एक 'प्यादे' (Pawn) के जरिए पेश किया है।
इसे हम निम्नलिखित बातों में समझ सकते हैं:
1. प्यादे की बेअहमियत और उसका त्रासदी
शतरंज में सब से महत्वपूर्ण मोहरा 'शाह' होता है और सारी जंग इसी को बचाने या गिराने के लिए होती है। लेकिन आपने ध्यान 'शाह' या 'मात' पर देने के बजाय इस मोहरे पर दी है जिसे आम तौर पर कोई गिनती में नहीं लाता। यह इस बात की ओर इशारा है कि दुनिया के बड़े बड़े फैसलों और घटनाओं (विपदाओं) से पहले जो आम इंसान या 'प्यादा सिफत' लोग कुर्बान हो जाते हैं, उनका दर्द कोई नहीं देखता।
2. समय से पहले का अंजाम
आपके अशआर की यह पंक्ति बेहद शानदार है:
"कभी इस शाह से पहले और कभी इस मात से पहले... हमेशा कत्ल हो जाता है"
आम तौर पर खेल का अंजाम 'शाह' या 'मात' पर होता है, लेकिन आपका किरदार (प्यादा) खेल के तार्किक अंजाम तक भी नहीं पहुंच पाता। यह जिंदगी के इस बेरहम पहलू को दर्शाता है जहां एक इंसान अपनी बारी आने या अपना मकसद पूरा होने से पहले ही हालातों का शिकार हो जाता है।
3. 'बेनाम' कुर्बानी का दर्द
इस कलाम में तीसरी बड़ी वजह यह है कि यह कुर्बानी की बेमानीपन को बयां करता है। प्यादा मरता है ताकि बादशाह बच सके, लेकिन यहां प्यादा अपनी इस कुर्बानी को किसी मकसद के तहत नहीं बलकि एक 'मजबूरी' और 'तकदीर' के तौर पर देख रहा है। यह अहसासे कमतरी नहीं बलकि हालातों की सच्ची और कड़वी नकल है।
खुलासा यह कि: तीसरी वजह इस कलाम का वह दर्द (Pathos) है जो पाठक को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम सब सिर्फ मोहरे हैं? और क्या हमारी अवधि सिर्फ एक 'चाल' जितनी है?
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